सोमवार, 26 अप्रैल 2010

इन्साफ हो किस तरह कि दिल साफ नही है



इस दहर में सब कुछ है पा इन्साफ नहीं है।
इन्साफ हो किस तरह कि दिल साफ नही है।

परमाणु अस्त्रों के सम्बन्ध में अनेक मंचों पर जब चिंता जताई जाती है तब हमकों एक कहानी याद आ जाती है-कुछ लोग एक मुर्दा उठायें हुए शमशान की ओर जा रहे थे, मोटा ताजा होने के कारण जब उसके भारीपन का एहसास हुआ तो उपाय सोचने हेतु उसे उतारा गया, फिर मुंह की ओर से कफ़न खोला, बड़ी बड़ी मूँछे देखकर एक सज्जन ने राय यह दी कि इसकी मूँछें उखाड़ लो।
अस्त्रों के अप्रसार, निरस्त्रीकरण आदि के अनेक समझौते हुए, एन0 पी0 टी0, सी0 टी0 बी0 टी0 की संधियाँ काफी पहले की हैं, परन्तु समस्या जहाँ थी वही अब भी हैं। बात यह है कि हुल्लड़ वही देश मचाते है जिनके पास विश्व भर के परमाणु हथियारों का 95 ज़खीरा मौजूदा है। यह हुल्लड़ भी इसलिये होता है कि वे दुसरो पर निशाना साधते रहें और किसी को उनकी ओर उंगली उठाने का मोका ने मिले।
आप ग़ौर करें कि चीन के पास 200, इस्राईल के पास 200, भारत, पाकिस्तान के पास 100-100 परन्तु अमेरिका व रूस के मिला कर 22 हजार से अधिक परमाणु हथियार हैं।
अप्रेल 10 के दुसरे सप्ताह में इस मामलें पर दो स्थानों पर र्वातायें हुईं।
सप्ताह के आरम्भ में चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग में अमेरिका राष्ट्रपति ओबामा तथा रूसी राष्ट्रपति मेदवेदेन ने परमाणु हथियारों में 30 कटौती के समझौते पर हस्ताक्षर किये। यह संधि 1991 की स्र्टाट संधि (स्ट्राटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी ) की जगह लेगी।
सप्ताह के अंत में नाभिकीय सुरक्षा सम्मेलन अमेरिका ने आयोजित किया, जिसमें भारत समेत 47 देशों नें परमाणु प्रौद्योगिकी था सूचना के गलत हाथों में न पड़ने देने का संकल्प लिया। ताकि सामग्री सूचना एवं तकनीक आतंकियों तक न पहुंचे। इस सम्मेलन से कुछ दिन पूर्व अमेरिकी विदेशी मंत्री हिलेरी किलंटन ने एक अमेरिकी यूनिवर्सिटी में भाषण देते हुए भारत पाकिस्तान को धमकाया यह कहते हुए कि इन्हीं देशों ने परमाणु संतुलन बिगाड़ा है। इसके लिये यह मुहावरा है उल्टे चोर कोतवाल को डांटे। इस भाषण में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात यह जरूर कही कि परमाणु अप्रसार संधि के तीन छोर हैं, पहला निरस्त्रीकरण, दूसरा अप्रसार, तीसरा परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण इस्तेमाल।
हथियारों को घटाना, उनका अप्रसार, गलत हाथों में न पड़ना, इन सब बातों से बेहतर तो यही था कि मूल मुद्दे निरस्त्रीकरण पर दो टूक बाते की जाती। 1945 में इसकी भयावह तस्वीर सामने आई थी, जब अमेरिका ने नागासाकी शहर पर बम छोड़ा जिससे 90 हजार लोग मरे, फिर हिरोशियमा पर बम ब्लास्ट में एक लाख चालीस हजार जाने गई तथा 69 फीसदी इमारते नष्ट हो गई।
यह सच मानिये कि परमाणु प्रसार के मामले में अमेरिका की सब से बड़ा अपराधी है, 1945 के बाद से आज तक 65 वर्ष हो चुके हैं परन्तु मुख्य मुद्दे से ध्यान हटाने की बाते होती रहती हैक्ं। यदि पूर्ण निरस्त्रीकरण लागू हो जाये तो सभी समस्यायें सुलझ जायें। अब उत्तर कोरिया और ईरान यदि अपराधी हैं तो उन्हें सजा जरूर दीजिये लेकिन इस्राईल का दोष क्यों नजर नहीं आता?

नक्सलवाद का जवाब भ्रष्ट पंचायती राज नहीं हो सकता


आज पूरा देश नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव से परेशान है ऐसे में देश के मुखिया का चिंतित होना भी लाजिमी है.लेकिन सिर्फ चिंतित होने से तो कुछ होनेजानेवाला हैं नहीं. इसके लिए प्रभावी कदम उठाने पड़ेंगे और कोई सरकार प्रभावी कदम तभी उठा सकती है जब उसे ग्रास रूट लेवल पर हालात क्या हैं की समझ हो या जानकारी हो.लेकिन लगता है हमारे देश के वर्तमान मुखिया को इस बात की जानकारी नहीं है कि पंचायती राज के दौरान पंचायतों में क्या हो रहा है.नहीं तो ऐसा वे बिल्कुल भी नहीं कहते कि हम नक्सलवाद का जवाब पंचायती राज से देंगे.दरअसल पंचायतों में जो लूट का खुला खेल चल रहा है उससे जनता का नहीं बल्कि ग्राम प्रधानों और उनके चमचों का कायाकल्प हो रहा है.प्रधानमंत्रीजी अगर गांवों में जाएँ तो उन्हें पता चलेगा कि बहुप्रचारित मनरेगा के तहत दी जानेवाली लगभग पूरी राशि को किस तरह फर्जीवाड़े की सहायता से प्रधानजी डकार जा रहे हैं.किसी भी योजना में सरकार के लिए सिर्फ राशि उपलब्ध करवा देना ही काफी नहीं होता बल्कि उस धन का उपयोग उचित तरीके से हो रहा है कि नहीं यह देखना भी सरकार का ही काम है.पूरे देश में गरीबों के बढ़ते समर्थन के बल पर दिन दूनी रात चौगुनी की गति से बढ़ रही नक्सलवाद की समस्या का मुकाबला भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चुके पंचायती राज के माध्यम से भला कैसे किया जा सकता है?यह तभी नक्सलवाद की काट बन सकता है जब इसे भ्रष्टाचार से मुक्त कर दिया जाए जिससे गरीबों को वास्तव में लाभ हो उन्हें लगे कि भारत सरकार को उनकी भी चिंता है और वे भी देश के लिए कुछ महत्व रखते हैं और देश के लिए कुछ कर सकते हैं.वर्तमान पंचायती राज में कुछ लोग भ्रष्टाचार की माया से गरीब से बहुत ही धनी होते जा रहे हैं जबकि ज्यादातर गरीब जनता पहले भी मूकदर्शक थी और अब भी मूकदर्शक है.लेकिन वे चुप भले ही हों उनके अन्दर नाराजगी का एक ज्वालामुखी उबाल मार रहा है और उन्हें बहकाने के लिए नक्सली नेता उपलब्ध हैं ही.इसलिए मनमोहन जी ड्राईंग रूम में बैठकर योजनायें और बातें बनाना छोड़िये और ग्रास रूट लेवल पर जो समस्याएं हैं का अध्ययन करिए और उनका समाधान खोजिये.अन्यथा एक दिन आपकी ही तरह शाहे बेखबर रहे बहादुर शाह जफ़र की तरह आपका शासन भी दिल्ली से पालम तक रह जायेगा.