सोमवार, 19 अप्रैल 2010

जब-जब आघात लगा, जब-जब किसी ने पीठ में छुरा घोंपा, तब-तब मैं रोया।


आज की पत्रकारिता
आज की पत्रकारिता में सब कुछ फास्‍ट फूड ज्‍वायंट जैसा हो गया है। धैर्य ‍बिलकुल भी नहीं है। आज के बच्‍चों को ज्‍वाइन करने के तीसरे दिन ही पीएम की बीट चाहिए, क्राइम बीट चाहिए। इसका कारण है कि आजकल बच्‍चों की न तो सैद्धान्‍ति‍क ट्रेनिंग होती है और न ही मानसि‍क। बल्कि नट-वोल्‍ट को फिट करने की ट्रेनिंग होती है। भाषा और पढ़ाई से ज्यादा अब जरूरत इस बात की है कि आपको क्वार्क एक्सप्रेस, फोटो शाप, वीडियो एडिटिंग, वाइस ओवर, लेआउट इत्यादि आता है या नहीं। पत्रकारिता से जन-सरोकार कम होता जा रहा है। मगर हमेशा ऐसा नहीं होगा। अल्टीमेटली, कंटेंट ही रूल करेगा। पत्रकारिता के कई फास्ट फूड ज्वायंट फिलहाल बंदी के कगार पर हैं। चलेगा वही जो टिकेगा और टिकेगा वही जो इस देश की आम जनता और अपने पाठक की बात करेगा।
पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को राष्ट्रपति का एट होम कैसे होता होगा। किस स्तर के लोग वहां बुलाए जाते होंगे। इत्यादि-इत्यादि। जब ये इच्छाएं पैदा हुईं तो अपने अखबार में बेचैनी भी पैदा होने लगी। क्योंकि, इन तमाम जगहों पर, महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ की जाने वाली तमाम यात्राओं में संपादक जी का नाम ही सर्वोपरि होता था।
बाजार का प्रभाव मीडि‍या पर है, इसमें कोई दो-राय नहीं है और बाजार का प्रभाव इसलि‍ए भी पड़ेगा क्‍योंकि एक 16 पृष्‍ठ वाला अखबार बनाने के लिए लगभग 18-20 रुपये का खर्चा आता है और पाठक अखबार खरीदता है 2 या तीन रुपये में। अब इनमें जो 15-16 रुपए का गैप है, उसे बाजार भरता है। बाजार अगर देगा तो लेना भी चाहेगा।
पत्रकारिता में अरुण शौरी ने मुझे बेहद प्रभावित किया। उनके एक इन्‍टरव्‍यू को मैंने पढ़ा जिसमें उनसे किसी ने पूछा था कि खोजी पत्रकारिता क्या है? श्री शौरी का जवाब था कि सरकारी कागजातों के मध्‍य वि‍रोधाभास ढूंढना ही सबसे बड़ी खोजी पत्रकारिता है। वाकई में खोजी पत्रकारिता फावड़े या कुदाल को लेकर नहीं किया जा सकता।
रजनीश में रुचि उनकी सबसे चर्चित पुस्तक ‘संभोग से समाधि की ओर’ से पैदा हुई पर महावीर और कृष्ण पर उनकी पुस्तकों ने उनके प्रति सम्मान का भाव जगाया।
पत्रकारिता में ड्रिंक का महत्‍व इतना है कि यदि‍ आप किसी प्रोफेशनल बैठक में हैं, तो सामने वाला व्‍यक्‍ति‍ आपसे खुलता जाता है। अमूमन हम सब स्वयं से भागने के लि‍ए शराब पीते हैं। शराब आपको कुछ देता-दिलाता नहीं है। लेकिन कुछ भूलने में, सहज होने में मदद जरूर करता है।
कहां तो तय था चि‍रागा हर एक घर के लि‍ए

यहां चराग मयस्‍सर नहीं सहर के लि‍ए’
अगर अख़बार चारण का काम करने लगेंगे तो जनता के सवालों को सरकार तक कौन पहुंचाएगा?
सरकार की योजनाओं और कामों को प्रचारित करने के लिए जनसंपर्क विभाग होता है। हर सरकार यही चाहती है कि उसके अच्छे कामों का प्रचार हो और सरकार की कमज़ोरियां बाहर न आएं. सरकार की विफलताओं और कमजोरियों को जनता के सामने लाना मीडिया का काम है. लेकिन बिहार में स्थिति अलग है. बिहार में अघोषित सेंसरशिप लागू है. पटना के अख़बारों ने नीतीश सरकार की ग़लतियों और बुराइयों को छापना बंद कर दिया है. सरकार के ख़िलाफ़ ख़बर छापने पर अख़बार मालिकों को माफी मांगनी पड़ती है और ख़बर लिखने वाले पत्रकार को सजा मिलती है. बिहार के मीडिया ने सरकार के सामने घुटने टेक दिए हैं और वह जनसंपर्क विभाग की तरह काम कर रहा है.
रूप में छपवाने की कोशिश की, लेकिन फिर भी किसी अख़बार ने उस ख़बर को छापने की हिम्मत नहीं की। बिहार के अख़बारों पर नज़र डालें तो एक अजीबोग़रीब पैटर्न दिखता है. पहले पेज पर सरकार के अच्छे कामों का बढ़ा-चढ़ा ब्यौरा मिलता है, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अच्छी तस्वीर होती है और बाक़ी जगह पर हत्या, बलात्कार और लूट की ख़बरें होती हैं. जितना विकास हुआ नहीं, अख़बार उससे कहीं ज़्यादा ढोल पीटते हैं. नीतीश कुमार के विरोधियों, दूसरे नेताओं और उनके विचारों को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाता है. बिहार के कुछ पत्रकारों से बात करने पर पता चला कि वे राज्य की समस्याओं के बारे में लिखना चाहते हैं, लेकिन उनकी कलम को रोक दिया जाता है. जिस अख़बार में नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ ख़बर छप जाती है, उस अख़बार को सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो जाता है. यह तब तक बंद रहता है, जब तक अख़बार के मालिक बिहार सरकार के मुखिया के पास जाकर गिड़गिड़ाते नहीं हैं.
ज़्यादातर अख़बार और न्यूज़ चैनल चारणों की तरह नीतीश सरकार की शान में क़सीदे ऐसे पढ़ते और लिखते हैं कि जैसे आप बिहार सरकार का चैनल देख रहे हों या फिर बिहार सरकार के पब्लिक रिलेशन डिपार्टमेंट का कोई पर्चा पढ़ रहे हों। इस साल चुनाव होने वाले हैं. नीतीश सरकार अपने पांच साल पूरे करने वाली है, लेकिन इस कार्यकाल के दौरान क्या-क्या कमियां रहीं, यह छापने या दिखाने की हिम्मत कोई भी अख़बार या न्यूज़ चैनल नहीं कर सका. कुछ लोग यह कह सकते हैं कि बिहार सरकार मीडिया को मैनेज कर रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि मीडिया ख़ुद बिकने के लिए बाज़ार में खड़ा है. सरकार को उसे मैनेज करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह ख़ुद मैनेज होने के लिए तैयार बैठा है.
एनडीए की सरकार ने भी शाइनिंग इंडिया के विज्ञापन के नाम पर मीडिया को करोड़ों रुपये दिए थे। उस व़क्त भी अख़बारों और टीवी चैनलों ने चुनाव से पहले एनडीए की सरकार को विजयी घोषित कर दिया था. उस चुनाव का परिणाम क्या निकला, यह भी हम लोगों के सामने है. सरकार के जनसंपर्क विभाग की तरह काम करना बिहार में पत्रकारिता का नया चेहरा है. क्या कारण है कि हड़ताल से बिहार में पूरा तंत्र चरमरा जाता है और अख़बारों में इस ख़बर को अंदर के पन्नों में छोटी सी जगह मिल पाती है. क्यों सरकार के विरोधियों को विलेन के रूप में पेश किया जाता है. नीतीश सरकार ने सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल कर अख़बार मालिकों को लालच दिया और अख़बारों को पालतू बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.]
हार में यह अघोषित सेंसरशिप बहुत ही सुनियोजित ढंग से लागू की गई है और अख़बारों को अपने हित में इस्तेमाल कर उन्हें राज्य सरकार का एजेंट बना डाला गया है. मंदी के दौर में नीतीश सरकार ने मीडिया की कमज़ोरी को भलीभांति समझा और सरकारी विज्ञापन को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया. ऐसे-ऐसे हथकंडे अपनाए गए, जिन्हें हम तानाशाही से जोड़ कर देख सकते हैं. लालू-राबड़ी की सरकार के दौरान बिहार में जंगलराज पर हमेशा कुछ न कुछ ख़बरें छपा करती थीं, लेकिन वर्तमान दौर में ख़बर छापने से पहले इस बात का ख्याल रखा जाता है कि सरकार के मुखिया का राजनीतिक क़द कम न हो जाए. दरअसल, नीतीश सरकार ने मीडिया की कमज़ोरी को पहचान लिया है. और, यह कमज़ोरी है विज्ञापन की. नीतीश सरकार ने विज्ञापनों के सहारे मीडिया को नियंत्रित रखने का काम बख़ूबी किया है. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से साल 2005 से 2010 के बीच (नीतीश कुमार के कार्यकाल के चार सालों में) लगभग 64.48 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिए गए. जबकि लालू-राबड़ी सरकार के कार्यकाल के अंतिम 6 सालों में महज़ 23.90 करोड़ रुपये ही ख़र्च हुए थे.