
महात्मा के नाम से संबोधित किये जाने वाले गांधीजी की स्त्री के प्रति आसक्ति को लेकर उनकी शहादत के कई दशकों के बाद अब एक बार फिर बहस चल रही है।यह गांधी के दर्शन का वह पक्ष है जिसे गांधी-भक्त उनके जीवन काल में और उनकी मृत्यु के बाद भी सलीके से परदे के पीछे रखते आ रहे हैं, वह पक्ष है गांधी जी का कुछ स्त्रियों के साथ विशेष आचरण या उनके 'ब्रह्मचर्य प्रयोग'। गांधी भक्तों का इस पक्ष में ऑंख मूँदना इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि इन प्रयोगों में कुछ ऐसा अवश्य था जो इनकी नैतिकता के मापदंड पर खरा नहीं उतरता है। सवाल यह भी उठता है कि उन्होंने स्त्री का उपयोग अपने प्रयोगों में इस हद तक जाकर क्यों किया? हालांकि गांधी जी ने इन प्रयोगों को गुप्त नहीं रखा। आश्रम जीवन में यह संभव भी नहीं था पर इन्हें अन्य प्रयोगों की तरह सार्वजनिक भी नहीं किया। निकट सहयोगियों की आलोचना के दबाव में जब भी उन्हें चर्चा करना पड़ी तो घुमा-फिरा कर की। गांधी जी ने एक पत्र में लिखा था कि 'मुझे मालूम है कि कैम्प के सभी लोग जानते हैं कि मनु मेरी खाट में साझेदारी करती है। वैसे भी मैं छुपाकर कुछ नहीं करना चाहता हँ। मैं इसको विज्ञापित नहीं कर रहा हूँ। यह मेरे लिए अत्यंत पवित्र चीज है।' संदेह और अविश्वास को दूर करने के लिए फरवरी 1947 में गांधीजी ने नोआखाली की एक प्रार्थना सभा में मनु के साथ बिस्तर की साझेदारी की बात सबके सामने रखी। लेकिन यह नहीं बतलाया कि इस साझेदारी में मनु वस्त्रहीन अवस्था में होती थी। गांधी जी ने स्वयं इस विषय को खुली बहस के बाहर रखा था। बहस यदि आज चलायी जाए तो निरर्थक होगी। गांधी जी का ब्रह्मचर्य का व्रत बहस के परे हो सकता है। पर जिन महिलाओं पर उन्होंने अपने प्रयोग किये उन पर क्या बीती होगी, यह बहस और विश्लेषण के परे नहीं हो सकता। गांधी जी के प्रयोगों की जाँच इसलिए आवश्यक हो जाती है, क्योंकि इन्हीं प्रयोगों में वे विचार-सूत्र छिपे हैं जिनसे गांधी जी ने स्त्री-मानस की बनावट तथा स्त्री महत्ता के संबंध में अपने आदर्श खड़े किये हैं। प्रयोगों की चर्चा का एक कारण और भी है स्त्री, ग़ांधी जी के अहिंसा-दर्शन का एक महत्वपूर्ण अंग है।
ब्रह्मचर्य प्रयोग और गांधी जी द्वारा अंकित स्त्री की छवि में कितना गहरा पारस्परिक संबंध है इसे समझने के लिए हमें उन विचारों पर दृष्टि डालनी होगी जो उन्होंने स्त्री-जाति को लेकर व्यक्त किये हैं। स्त्री को परिभाषित करते हुए गांधी जी ने लिखा है कि 'स्त्री अहिंसा की प्रतिमूर्ति है। अहिंसा का अर्थ है असीम प्रेम, जिसका दूसरा अर्थ है दुख भोगने की अपार क्षमता।' स्वभाव से अहिंसक होने के कारण पुरुष की तुलना में 'स्त्री अधिक सदाचारी है।' 'धर्म और आत्मत्याग' से उपजी व्यथा को स्त्री सहर्ष झेल लेती है। सेक्स के प्रति स्त्री की रुचि पति की आशा के सामने 'नतमस्तक' होने और 'आत्मत्याग' के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। स्त्री का 'प्रेम नि:स्वार्थ और मातृत्वपूर्ण है।' गांधी जी का निवेदन था कि वह 'इस प्रेम को सारी मानवता की ओर मोड़ दे, उसे भूल जाना चाहिए कि वह पुरुष की कामुकता का लक्ष्य है।' जो स्त्री ऐसा करने में समर्थ होगी वह पुरुष की दृष्टि में माँ का, मूक नेता का गौरवमय पद प्राप्त करेगी।' स्त्री 'निरीह' और 'यौन इच्छा रहित है।' उसके आनंद का 'स्त्रोत' और जीवन की एकमात्र धुरी उसके मातृत्व में है। एक माँ, एक बहन और एक पत्नी के रूप में ही उसका जीवन सार्थक होता है।
स्त्री की इस स्वनिर्मित छवि को गांधीजी ने अपने ब्रह्मचर्य की आधारशिला बना लिया। 1906 में जब उन्होंने 37 वर्ष की आयु में ब्रह्मचर्य का व्रत लिया तो कस्तूरबा का मन टोहने की कोई आवश्यकता उन्होंने अनुभव नहीं की। स्त्री यौन- इच्छा रहित जो ठहरी। जब स्त्री गांधी जी के लिए भोग की वस्तु नहीं रही तो वह उनके प्रयोग की वस्तु बन गयी। ब्रह्मचर्य का व्रत ही पर्याप्त नहीं था। इस पर खरा उतरने के लिए गांधी जी को अपने को बार-बार कसौटी पर चढ़ाना भी अनिवार्य लगा। स्त्री ही ब्रह्मचर्य की एकमात्र कसौटी है, इसलिए उन्होंने अपने आश्रम की अनेक स्त्री कार्यकर्ताओं को अपने 'ब्रह्मचर्य प्रयोगों' की कसौटी बना डाला। गांधी जी को पूरा भरोसा था कि उनके प्रयोगों की कसौटी बनी स्त्री को किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक क्षति नहीं पहँचेगी। उनके अडिग ब्रह्मचर्य के रहते उनके बिस्तर पर लेटा स्त्री का नग्न शरीर पूरी तरह से सुरक्षित था।तीन को छोड़कर बाकी जिन स्त्रियों पर ब्रह्मचर्य का प्रयोग किया गया उनको गांधी जी और उनके सहयोगियों ने गुमनाम रखा है।गांधी जी नोआखली के दौरे पर न निकले होते तो मनु, आभा और सुशीला नैयर के नाम भी सामने नहीं आते। 1८ वर्षीय मनु गांधी जिनका लालन-पालन गांधी जी की देखरेख में हुआ था और जो उनके भतीजे की बेटी थी, नोआखली के हिंसक वातावरण में गांधी जी के प्रयोग की कसौटी बनी। गांधी जी ने घोषित किया यदि मैं ब्रह्मचर्य पर पूरी विजय पा जाऊँ तो 'मैं जिन्ना को इसमें पाकिस्तान बनाने में परास्त कर दूँगा।'
यह हाड-मांस की स्त्री वैसे ही यौन-इच्छा रहित थी जैसी कि गांधी जी ने वर्णित की तब अपने हर 'प्रयोग' के बाद वे अपने बिस्तर पर लेटने वाली स्त्री से यह क्यों जानना चाहते थे कि उसके अन्दर कोई इन्द्रिय भावना तो नहीं जागी।' 'कोई कुविचार तो मन में नहीं आया? स्त्री के नकारात्मक उत्तर से वे तुरन्त संतुष्ट क्यों हो जाते थे? कैसे मान लिया जाय कि जब वस्त्रहीन स्त्री उनके शरीर के कंपन को रोकने के लिए रात में (गांधी जी का शरीर कई बार कंपन का शिकार हो जाता था) उन्हें अपनी बाहों में समेटती थी तो भीतर से सर्वथा निर्विकार बनी रहती थी? यदि सब भावनाविहीन कठपुतलियाँ थीं तो इनमें से कइयों का मानसिक संतुलन क्यों बिगड़ गया?
गांधी जी के निकटतम सहयोगी उनसे इस बात से सहमत नहीं थे कि इन प्रयोगों से स्त्रियों में कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी या उनको किसी प्रकार की हानि नहीं भरनी पड़ रही थी। निर्मल कुमार बोस जो नोआखली में गांधी जी के साथ थे, प्रयोगों का माध्यम बनायी गयी स्त्रियों की मानसिक दुर्दशा के प्रति उदासीन नहीं रह पाये। विक्षुब्ध होकर उन्होंने गांधी जी के साथ इस विषय पर कई बार मौखिक और पत्रों द्वारा बहस की। प्रयोगों से इन स्त्रियों का व्यक्तित्व कैसे छिन्न-भिन्न हो रहा था इससे गांधी जी को अवगत कराना उन्होंने अपना कर्तव्य समझा। गांधी जी ने उनसे असहमत होते हुए उत्तर दिया- 'अ, ब, स की हिस्टिरिया की बीमारी का मेरे प्रयोगों से कोई संबंध नहीं है। प्रयोग के बाद आज वे वैसी ही हैं जैसे पहले थीं।' सच्चाई कुछ और थी। इन तनावग्रस्त स्त्रियों की दबी यौन-इच्छा बापू की निकटता पाने की स्पर्धा में बदल गयी। बोस ने ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख किया है। एक बार सुशीला नैयर की उनके साथ चलने की जिद पर क्रोधित होकर गांधी जी अपना माथा ठोंककर रोने लगे थे। इन स्त्रियों के तनाव से जो वातावरण खड़ा हुआ उससे गांधी जी अछूते नहीं रह सके। बोस ने गांधी जी को लिखा 'उसके विरुध्द (स्त्री का नाम नहीं दिया है) मेरा यह आरोप है कि वह ब्यूरोक्रेटिक हो गयी है और ऐसी घड़ी में आपके समय का अधिकांश भाग ले रही है, जब राष्ट्रहित के लिए आपकी एकाग्र सेवाओं की आवश्यकता है। मैंने देखा कि- 'हर बार वह आपके पास होती थी, आपका मन अशांत हो जाता था। इससे आपकी कार्यक्षमता में निश्चित रूप से बाधा आती थी।'
गांधी जी के प्रयोगों में जो स्त्रियाँ सम्मिलित हुईं उन्होंने ऐसा स्वेच्छा से और समझ-बूझकर नहीं किया था। भावनात्मक रूप से उन पर निर्भर होने के कारण उन्होंने उनकी आज्ञा का पालन मात्र किया था। आभा गांधी का यह कथन ध्यान देने योग्य है- 'यह सभी को पता था कि सुशीला नैयर बापू के साथ सोती थी। मुझे पहली बार जब सोने को कहा गया तो मैं सोलह वर्ष की थी। मैंने सोचा रात में उनको सर्दी लगती है, उन्हें गरम रखने के लिए मुझे सोने के लिए कहा गया है, दो साल के बाद नोआखाली में मैं नियमित रूप से उनके साथ सोती थी।' गांधी जी की इन स्त्रियों के सामाजिक संबंध भी अप्रभावित नहीं रहे। काका कालेलकर के पुत्र ने सुशीला नैयर की गांधी भक्ति से पीड़ित होकर उनके साथ अपनी सगाई तोड़ दी। भावी पत्नी की गांधी भक्ति के कारण विवाहित जीवन का समन्वय उन्हें असंभव सा लगा। आभा गांधी के पति भी इन प्रयोगों से दुखी थे। इस मामले को लेकर उनकी और उनके मित्रों की गांधी जी से नोंक-झोंक भी हुई। उन लोगों का सम्मिलित निवेदन था- 'बापू आप प्रसिध्द महात्मा हैं। आपको इस आपत्तिजनक ढंग से अपनी परीक्षा नहीं लेनी चाहिए। ऐसी परीक्षा मैथुन-क्षम युवक के लिए अधिक उपयुक्त है। 'बापू ने उन सबको सुना, कुछ कहा नहीं' और अपने प्रयोगों को जारी रखा। राष्ट्रीय जीवन में गांधीजी की महत्ता ने इन साधारण लोगों को नैतिक रूप से बौना बना दिया था। अपने प्रतिवाद को वे खुले मैदान में लाने का साहस नहीं जुटा पाए। सुशीला नैयर के अनुसार इन प्रयोगों का ब्रह्मचर्य से कोई संबंध नहीं था। जब वह गांधी जी के बिस्तर पर लेटती थी, तब बापू प्राय: उनसे पीठ दबाने को कहते थे। कभी-कभी दबाव डालने के लिए पीठ पर लेट जाती थी, आरम्भ में इसे ब्रह्मचर्य का प्रयोग कहने का कोई प्रश्न नहीं उठता है। यह केवल प्राकृतिक चिकित्सा का हिस्सा था। बाद में जब लोगों ने (स्त्रियों के साथ) मनु के साथ, आभा के साथ, मेरे साथ- उनके शारीरिक स्पर्श को लेकर सवाल पूछने शुरू किये (तब) ब्रह्मचर्य का आदर्श का प्रतिपादन किया गया।
गांधी जी का आश्रम प्रयोगशाला की तरह था जिसमें तरह-तरह के प्रयोग किये गये। किन्तु स्त्रियों को लेकर जो भी प्रयोग किये गये उन सभी में उनकी संवेदनहीनता और निष्ठुरता स्पष्ट प्रकट होती है। अपने शैया प्रयोग के पहले ब्रह्मचर्य को नापने-जोखने की प्रक्रिया विकसित करने के कई प्रयोग दूसरों पर किये। दक्षिण अफ्रीका में किये गये एक प्रयोग का वर्णन स्वयं गांधी के शब्दों में- 'यह मेरा प्रयोग था। मैंने उन लड़कों को जो शैतानी के लिए जाने जाते थे, भोली युवा लड़कियों के साथ एक ही स्थान पर, एक ही समय में नहाने के लिए भेज दिया। मैंने उन बच्चों को आत्मसंयम का कर्तव्य भली प्रकार समझा दिया था, बच्चों को नहाने के लिए मिलने देना और आशा करना कि वे निष्पाप बने रहेंगे क्या मूर्खता की बात थी? मेरी ऑंखे लड़कियों पर वैसे ही लगी रहती थीं जैसे एक माँ की बेटी पर।' एक दिन किसी ने आकर गांधी जी को खबर दी कि लड़के दो लड़कियों का विशेषकर और बाकी लड़कियों का भी मजाक उड़ाते हैं। गांधी जी लिखते हैं- 'इस खबर से मैं काँप गया, मैंने युवकों को डाँटा। किन्तु यह पर्याप्त नहीं था। मैं चाहता था कि चेतावनी के नाते उन लड़कियों के शरीर पर कुछ चिह्न हों, ताकि किसी भी युवक की कुद्रष्टि उन पर न पड़े और हर लड़की के लिए एक सबक हो कि कोई भी उसकी शुचिता पर हमला करने का साहस न कर पाए। लड़कियाँ कौन सा चिह्न धारण करें जो उन्हें सुरक्षा की भावना देने के साथ-साथ पापी की ऑंखों को भी निस्तेज कर दे? इस प्रश्न ने मुझे रात भर जगाए रखा। प्रात: मैंने लड़कियों को परामर्श दिया कि वे मुझे अपने लंबे बाल काटने दें, लड़कियों ने मेरी बात नहीं सुनी। मैंने बड़ी उम्र की लड़कियों को स्थिति पहले ही समझा दी थी। उन्हें मेरी भावना पर संदेह नहीं था, पर मेरे परामर्श पर विचार करने के लिए वे तैयार नहीं थीं। अंतत: उन्होंने मुझे अपना समर्थन दे दिया।' बाल काटने का सरल समाधान गांधी जी ने एक विपरीत संदर्भ में भी लागू किया। अपने 20 वर्षीय पुत्र के साथ एक विवाहित स्त्री के आपत्तिजनक व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने न केवल दो सप्ताह का उपवास रखा, बल्कि उस विवाहित स्त्री के बाल भी कटवा दिए।
ब्रह्मचर्य के उच्चतम सोपान तक पहुँचने के लिए गांधी जी ने स्त्रियों को किस तरह माध्यम बनाया यह उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट है। पुरुष की कुद्रष्टि का इलाज उन्होंने स्त्री को उस सबसे वंचित करने में पाया जो उसे स्त्री की पहचान देता है। पारंपरिक समाज में स्त्री के बाल काटना उसका सबसे बड़ा अपमान है। ऐसा दंड उन स्त्रियों को दिया जाता है जो समाज से तिरस्कृत कर दी जाती हैं। यह शरीर को दागने के समान है। हैरानी की बात तो यह है कि जो दंड उन्होंने विवाहित स्त्री को दिया वही निर्दोष भोली युवा लड़कियों को भी दिया। व्यक्तित्वहीन,अस्मिताहीन स्त्री ही गांधी जी के लिए सच्ची स्त्री थी। स्त्री की सहनशीलता को महिमामंडित करके उसके शोषण को उसके स्त्रीत्व की परीक्षा में बदल दिया। उन्हें यह सोचने की आवश्यकता नहीं हुई कि यह तथाकथित सहनशीलता वास्तव में उसकी विवशता है- कस्तूरबा के सामने गांधीजी की आज्ञाओं को शिरोधार्य करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। जिस स्त्री में प्रकृतिजन्य भावनाएँ हैं, जो स्त्री प्रतिवाद के स्वर से परिचित है, जिसकी कोई अस्मिता है, उसको गांधी जी ने समूची स्त्री जाति से बहिष्कृत कर दिया। मानो वह स्त्री नहीं कुछ और है। इस कुछ और को पारंपरिक समाज डायन, कुलटा आदि उपाधियों से विभूषित करता है। गांधी जी ने इन शब्दों का प्रयोग तो नहीं किया है, पर उनका आशय कुछ भिन्न नहीं था।
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