जब-जब आघात लगा, जब-जब किसी ने पीठ में छुरा घोंपा, तब-तब मैं रोया।
आज की पत्रकारिता
आज की पत्रकारिता में सब कुछ फास्ट फूड ज्वायंट जैसा हो गया है। धैर्य बिलकुल भी नहीं है। आज के बच्चों को ज्वाइन करने के तीसरे दिन ही पीएम की बीट चाहिए, क्राइम बीट चाहिए। इसका कारण है कि आजकल बच्चों की न तो सैद्धान्तिक ट्रेनिंग होती है और न ही मानसिक। बल्कि नट-वोल्ट को फिट करने की ट्रेनिंग होती है। भाषा और पढ़ाई से ज्यादा अब जरूरत इस बात की है कि आपको क्वार्क एक्सप्रेस, फोटो शाप, वीडियो एडिटिंग, वाइस ओवर, लेआउट इत्यादि आता है या नहीं। पत्रकारिता से जन-सरोकार कम होता जा रहा है। मगर हमेशा ऐसा नहीं होगा। अल्टीमेटली, कंटेंट ही रूल करेगा। पत्रकारिता के कई फास्ट फूड ज्वायंट फिलहाल बंदी के कगार पर हैं। चलेगा वही जो टिकेगा और टिकेगा वही जो इस देश की आम जनता और अपने पाठक की बात करेगा।
पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को राष्ट्रपति का एट होम कैसे होता होगा। किस स्तर के लोग वहां बुलाए जाते होंगे। इत्यादि-इत्यादि। जब ये इच्छाएं पैदा हुईं तो अपने अखबार में बेचैनी भी पैदा होने लगी। क्योंकि, इन तमाम जगहों पर, महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ की जाने वाली तमाम यात्राओं में संपादक जी का नाम ही सर्वोपरि होता था।
बाजार का प्रभाव मीडिया पर है, इसमें कोई दो-राय नहीं है और बाजार का प्रभाव इसलिए भी पड़ेगा क्योंकि एक 16 पृष्ठ वाला अखबार बनाने के लिए लगभग 18-20 रुपये का खर्चा आता है और पाठक अखबार खरीदता है 2 या तीन रुपये में। अब इनमें जो 15-16 रुपए का गैप है, उसे बाजार भरता है। बाजार अगर देगा तो लेना भी चाहेगा।
पत्रकारिता में अरुण शौरी ने मुझे बेहद प्रभावित किया। उनके एक इन्टरव्यू को मैंने पढ़ा जिसमें उनसे किसी ने पूछा था कि खोजी पत्रकारिता क्या है? श्री शौरी का जवाब था कि सरकारी कागजातों के मध्य विरोधाभास ढूंढना ही सबसे बड़ी खोजी पत्रकारिता है। वाकई में खोजी पत्रकारिता फावड़े या कुदाल को लेकर नहीं किया जा सकता।
रजनीश में रुचि उनकी सबसे चर्चित पुस्तक ‘संभोग से समाधि की ओर’ से पैदा हुई पर महावीर और कृष्ण पर उनकी पुस्तकों ने उनके प्रति सम्मान का भाव जगाया।
पत्रकारिता में ड्रिंक का महत्व इतना है कि यदि आप किसी प्रोफेशनल बैठक में हैं, तो सामने वाला व्यक्ति आपसे खुलता जाता है। अमूमन हम सब स्वयं से भागने के लिए शराब पीते हैं। शराब आपको कुछ देता-दिलाता नहीं है। लेकिन कुछ भूलने में, सहज होने में मदद जरूर करता है।
कहां तो तय था चिरागा हर एक घर के लिए
यहां चराग मयस्सर नहीं सहर के लिए’
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें