मंगलवार, 4 मई 2010

"उसके गर्भाशय में 10-12 हफ्ते का शिशु भ्रूण था"


निरुपमा की तस्वीर को कम से कम दो-तीन बार ध्यान से ज़रूर देखिएगा....आपको नीरू की इस तस्वीर में कहीं न कहीं अपनी बेटी...बहन...ज़रूर नज़र आएगी....और अगर नहीं आती है तो फिर अपने आप को आइने में दो-चार बार ज़रूर देखिएगा .कि क्या आपमें इंसान होने के कितने लक्षण बचे हैं.
नीरू की गलती थी कि वो सही रास्ते से अपनी मंज़िल पाना चाहती थी...अगर नीरू बिना घरवालों की मर्ज़ी के ये शादी कर लेती तो ज़्यादा से ज़्यादा एक दो साल बाद यही लोग उसे वापस अपना लेते...पर हमारे तथाकथित सभ्य समाज को सीधे और सरल तरीके पसंद ही कहां हैं....हमारी गौरवशाली संस्कृति का दम भरने वाले ठेकेदार अब कहां हैं...और क्या नाम देंगे इसे...
जानता हूं कि अभी भी कई लोग सवाल करेंगे कि क्या गारंटी है कि नीरू ने आत्महत्या नहीं की उसका क़त्ल हुआ है....तो एक बार उसकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट (पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का लिंक...ज़रूर देखें) पूरा ज़रूर पढ़ें....चलिए आपको बता ही देते हैं सरल भाषा में ये क्या कहती है....

* उसकी श्वसन नली में कंजेशन था....
* उसके दोनो फेफड़ों में भी कंजेशन था...
* ह्रदय के दोनो कोष्ठों में रक्त था...
* उसके लिवर में कंजेशन था....
* उसकी किडनी में कंजेशन था...
* स्प्लीन में कंजेशन था...

मतलब कुल जमा ये कि उसकी मौत दम घुटने से हुई...और ये सामान्य बुद्धि है कि कोई भी अपना गला खुद घोंट कर आत्महत्या नहीं कर सकता है....
लेकिन सबसे दर्दनाक सच सामने लाती है पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की आखिरी लाइन.....

"उसके गर्भाशय में 10-12 हफ्ते का शिशु भ्रूण था"
बहुत से लोग अब इस पर भी उंगलियां उठाएंगे...नाक भौं सिकोड़ेंगे...क्योंकि समाज की सभ्यता का यही तकाज़ा है....किसी को नहीं बख्शेंगे ये लोग....पर मैं केवल ये जानता हूं कि अगर ये हत्या है तो ये दोहरा हत्याकांड है....
क्या कहूं....जिस धर्म...जाति और ईश्वर की ये समाज दुहाई देता है क्या वाकई उसका कोई अस्तित्व भी है....

क्या ये वही लोग हैं जो साल में दो बार 8 दिनों तक नारी शक्ति की पूजा पाठ कर्मकांड कर के नवें दिन कन्याओं के पैर छूते हैं.
माफ करना नीरू हम तुम्हें बचा नहीं पाए...पर क्या अफसोस करें तुम्हारे जैसी हज़ारों नीरू हम खो चुके हैं...शायद खोते भी रहेंगे....
मेरा पुनर्जन्म में कतई यकीन नहीं है...पर मैं जानता हूं एक और नीरू कहीं और जन्म ले चुकी है...उसकी होनी में क्या लिखा है....हक...या मौत

खबरदार करते न्यूज चैनलों में खबर कहां है?


एक झटके में लगा कि महिला आरक्षण को लेकर खबरों की जो संवेदनशीलता हिन्दी न्यूज चैनलों में दिखायी जा रही थी, उसने अपनी टीआरपी के खेल में खबरों की जगह टीआरपी वाले इंटरटेनमेंट चैनलों के सीरियलो की टीआरपी को भी खुद से जोड़ने की नायाब पहल शुरु कर दी है। कुछ इसी तर्ज पर खबरों को कवर करने से लेकर दिखाने का खेल भी न्यूज चैनल खुल्लम खुल्ला अपनाने लगे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स की कवरेज को लेकर दिल्ली में ओलंपिक एसोसिएशन ने न्यूज चैनलों को आमंत्रित किया। कमोवेश हर न्यूज चैनल के संपादक स्तर के पत्रकार कैमरा टीम के साथ इस बैठक में नजर आये। सभी के पास कॉमनवेल्थ गेम्स के कवरेज को लेकर प्लानिंग थी। और सभी सीधे सुरेश कलमाडी से संवाद बनाने में लगे थे।
वहीं माओवादियों के खिलाफ ग्रीन हंट शुरु होने के बाद पहली बार दिल्ली में सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी करते हुये कई लोग एकसाथ मंच पर आये। इसमें जानी मानी लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति राय, पूर्व आईएएस और नक्सलियों के बीच काम कर रहे बी डी शर्मा से लेकर मेनस्ट्रीम पत्रिका के संपादक सुमित चक्रवर्ती समेत कई क्षेत्रों से जुड़े आधे दर्जन से ज्यादा लोगों ने दिल्ली के फॉरेन प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीबीसी,रायटर्स और सीएनएन जैसे अंतरराष्ट्रीय चैनल और एजेंसियों के पत्रकार मौजूद थे।
सुरेश कलमाडी आज की तारीख में किसी भी न्यूज चैनल के संपादक के लिये सबसे बड़े व्यक्ति हैं। क्योंकि कॉमनवेल्थ के प्रचार प्रसार में मीडिया के हिस्से में करीब पाच सौ करोड़ का विज्ञापन है। और इस पूंजी को पाने के लिये कोई भी न्यूज चैनल अब यह खबर नहीं दिखा सकता है कि कॉमनवेल्थ की तैयारी कमजोर है। य़ा फिर दिल्ली में यमुना की जमीन से लेकर कॉमनवेल्थ के लिये दिल्ली में हजारों हजार पेड़ काटे जा चुके हैं और सिलसिला लगातार जारी भी है। यमुना की जमीन पर जिस तरह कॉमनवेल्थ के लिये कंक्रीट का जंगल खडा किया गया है, उससे सौ साल में सबसे ज्यादा पर्यावरण गर्म होने की स्थिति दिल्ली की है।इस पर भी कोई खबर दिखाना नहीं चाहता क्योंकि उसे डर है कि कहीं कॉमनवेल्थ के प्रचार-प्रसार का विज्ञापन उसकी झोली से ना खिसक जाये। साथ ही वह तमाम कॉरपोरेट कंपनियां, जिनका जुडाव कॉमनवेल्थ गेम्स से है उनको लेकर भी कमाल का प्रेम मीडिया ने दिखाना शुरु कर दिया है। क्योंकि निजी विज्ञापन भी करीब हजार करोड से ज्यादा का है, जिसका इंतजार मीडिया कर रहा है। मीडिया की पूरी नजर इस वक्त करोड़ों रुपए के इन विज्ञापनों पर ऐसी टिकी है कि उसे इसके अलावा कुछ दिखायी नहीं दे रहा।
जाहिर है खबरो को दिखाने के लिये सरकार से लाइसेंस ले कर खड़े हुये न्यूज चैनलो की समूची कतार ही जब खबरों को परिभाषित करने से पहले अपना मुनाफा और मुनाफे पर टिके धंधे को ही देख रही हो तब न्यूज को परिभाषित करने का तरीका भी बदलेगा और देश के हालात पर भी वही नजरिया सर्वमान्य करने की कोशिश होगी जो सरकार की नीति में फिट बैठे। ऐसे में अगर किसी न्यूज चैनल में किसी दुर्घटना या आतंकवादी हमला या फिर ब्लास्ट से इतर कोई भी खबर दिखायी दे जाये तो एक बार उसकी तह में जाकर जरुर देखना चाहिये क्योंकि बिना मुनाफे के कोई खबर खबर बन ही नहीं सकती।

सोमवार, 3 मई 2010

डिजाइनर कपड़ों के लिए जिस्म

हॉन्गकॉन्ग में डिजाइनर और ब्रैंडेड कपड़े खरीदने के लिए छात्राएं जिस्म बेच रही हैं। हाल में जारी एक सर्वे में यह चौंकानेवाली बात सामने आई है।
र्वे के मुताबिक, हॉन्गकॉन्ग की स्कूली छात्राएं डिजाइनर कपड़ों की खरीदारी के लिए अपना जिस्म बेच रही हैं। हॉन्गकॉन्ग में बढ़े रहे इस ट्रेन्ड को 'कॉम्पेन्सेटेड डेटिंग' का नाम दिया जा रहा है। इस सर्वे में शामिल 87 फीसदी लोगों ने कहा कि टीनएजर्स छात्राएं जिस्म बेचकर पैसे कमा रही हैं ताकि वे डिजाइनर और ब्रैंडेड कपड़े खरीद सकें। सर्वे में शामिल 6.6 फीसदी स्टूडंट्स ने भी स्वीकार किया कि वह ऐसी लड़कियों को जानते हैं, जिन्होंने डिजाइनर कपड़े खरीदने के लिए जिस्म बेचा है। सर्वे में कुल 3 हजार लोग शामिल हुए थे। पुलिस ने भी पिछले दिनों कई ऐसे लोगों को को गिरफ्तार किया है, जो इन छात्राओं के लिए दलाल का काम कर रहे थे।
गौरतलब है कि पिछले दिनों पुलिस ने एक 19 साल की लड़की को भी गिरफ्तार किया था। सिर्फ 1250 रुपये देकर एक पुरुष ने इस लड़की के साथ बस में ओरल सेक्स किया था और विडियो बनाया था। बाद में यह विडियो इंटरनेट पर जारी कर दिया गया था। गौर करने लायक बात यह है कि लड़की ने यह सब इसलिए किया था क्योंकि उसे फेमस बैग ब्रैंड गुची का बैग खरीदने के लिए पैसे चाहिए थे।

ऐसा मानना है कि 'कॉम्पेन्सेटेड डेटिंग' का चलन जापान के रास्ते हॉन्गकॉन्ग में आया है। अमूमन इसमें कम उम्र की लड़कियां पैसे लेकर उम्रदराज पुरुषों के साथ सेक्स संबंध बनाती हैं।

शनिवार, 1 मई 2010

स्त्री पर ही क्यों किये गांधी ने प्रयोग?


महात्मा के नाम से संबोधित किये जाने वाले गांधीजी की स्त्री के प्रति आसक्ति को लेकर उनकी शहादत के कई दशकों के बाद अब एक बार फिर बहस चल रही है।यह गांधी के दर्शन का वह पक्ष है जिसे गांधी-भक्त उनके जीवन काल में और उनकी मृत्यु के बाद भी सलीके से परदे के पीछे रखते आ रहे हैं, वह पक्ष है गांधी जी का कुछ स्त्रियों के साथ विशेष आचरण या उनके 'ब्रह्मचर्य प्रयोग'। गांधी भक्तों का इस पक्ष में ऑंख मूँदना इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि इन प्रयोगों में कुछ ऐसा अवश्य था जो इनकी नैतिकता के मापदंड पर खरा नहीं उतरता है। सवाल यह भी उठता है कि उन्होंने स्त्री का उपयोग अपने प्रयोगों में इस हद तक जाकर क्यों किया? हालांकि गांधी जी ने इन प्रयोगों को गुप्त नहीं रखा। आश्रम जीवन में यह संभव भी नहीं था पर इन्हें अन्य प्रयोगों की तरह सार्वजनिक भी नहीं किया। निकट सहयोगियों की आलोचना के दबाव में जब भी उन्हें चर्चा करना पड़ी तो घुमा-फिरा कर की। गांधी जी ने एक पत्र में लिखा था कि 'मुझे मालूम है कि कैम्प के सभी लोग जानते हैं कि मनु मेरी खाट में साझेदारी करती है। वैसे भी मैं छुपाकर कुछ नहीं करना चाहता हँ। मैं इसको विज्ञापित नहीं कर रहा हूँ। यह मेरे लिए अत्यंत पवित्र चीज है।' संदेह और अविश्वास को दूर करने के लिए फरवरी 1947 में गांधीजी ने नोआखाली की एक प्रार्थना सभा में मनु के साथ बिस्तर की साझेदारी की बात सबके सामने रखी। लेकिन यह नहीं बतलाया कि इस साझेदारी में मनु वस्त्रहीन अवस्था में होती थी। गांधी जी ने स्वयं इस विषय को खुली बहस के बाहर रखा था। बहस यदि आज चलायी जाए तो निरर्थक होगी। गांधी जी का ब्रह्मचर्य का व्रत बहस के परे हो सकता है। पर जिन महिलाओं पर उन्होंने अपने प्रयोग किये उन पर क्या बीती होगी, यह बहस और विश्लेषण के परे नहीं हो सकता। गांधी जी के प्रयोगों की जाँच इसलिए आवश्यक हो जाती है, क्योंकि इन्हीं प्रयोगों में वे विचार-सूत्र छिपे हैं जिनसे गांधी जी ने स्त्री-मानस की बनावट तथा स्त्री महत्ता के संबंध में अपने आदर्श खड़े किये हैं। प्रयोगों की चर्चा का एक कारण और भी है स्त्री, ग़ांधी जी के अहिंसा-दर्शन का एक महत्वपूर्ण अंग है।

ब्रह्मचर्य प्रयोग और गांधी जी द्वारा अंकित स्त्री की छवि में कितना गहरा पारस्परिक संबंध है इसे समझने के लिए हमें उन विचारों पर दृष्टि डालनी होगी जो उन्होंने स्त्री-जाति को लेकर व्यक्त किये हैं। स्त्री को परिभाषित करते हुए गांधी जी ने लिखा है कि 'स्त्री अहिंसा की प्रतिमूर्ति है। अहिंसा का अर्थ है असीम प्रेम, जिसका दूसरा अर्थ है दुख भोगने की अपार क्षमता।' स्वभाव से अहिंसक होने के कारण पुरुष की तुलना में 'स्त्री अधिक सदाचारी है।' 'धर्म और आत्मत्याग' से उपजी व्यथा को स्त्री सहर्ष झेल लेती है। सेक्स के प्रति स्त्री की रुचि पति की आशा के सामने 'नतमस्तक' होने और 'आत्मत्याग' के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। स्त्री का 'प्रेम नि:स्वार्थ और मातृत्वपूर्ण है।' गांधी जी का निवेदन था कि वह 'इस प्रेम को सारी मानवता की ओर मोड़ दे, उसे भूल जाना चाहिए कि वह पुरुष की कामुकता का लक्ष्य है।' जो स्त्री ऐसा करने में समर्थ होगी वह पुरुष की दृष्टि में माँ का, मूक नेता का गौरवमय पद प्राप्त करेगी।' स्त्री 'निरीह' और 'यौन इच्छा रहित है।' उसके आनंद का 'स्त्रोत' और जीवन की एकमात्र धुरी उसके मातृत्व में है। एक माँ, एक बहन और एक पत्नी के रूप में ही उसका जीवन सार्थक होता है।

स्त्री की इस स्वनिर्मित छवि को गांधीजी ने अपने ब्रह्मचर्य की आधारशिला बना लिया। 1906 में जब उन्होंने 37 वर्ष की आयु में ब्रह्मचर्य का व्रत लिया तो कस्तूरबा का मन टोहने की कोई आवश्यकता उन्होंने अनुभव नहीं की। स्त्री यौन- इच्छा रहित जो ठहरी। जब स्त्री गांधी जी के लिए भोग की वस्तु नहीं रही तो वह उनके प्रयोग की वस्तु बन गयी। ब्रह्मचर्य का व्रत ही पर्याप्त नहीं था। इस पर खरा उतरने के लिए गांधी जी को अपने को बार-बार कसौटी पर चढ़ाना भी अनिवार्य लगा। स्त्री ही ब्रह्मचर्य की एकमात्र कसौटी है, इसलिए उन्होंने अपने आश्रम की अनेक स्त्री कार्यकर्ताओं को अपने 'ब्रह्मचर्य प्रयोगों' की कसौटी बना डाला। गांधी जी को पूरा भरोसा था कि उनके प्रयोगों की कसौटी बनी स्त्री को किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक क्षति नहीं पहँचेगी। उनके अडिग ब्रह्मचर्य के रहते उनके बिस्तर पर लेटा स्त्री का नग्न शरीर पूरी तरह से सुरक्षित था।तीन को छोड़कर बाकी जिन स्त्रियों पर ब्रह्मचर्य का प्रयोग किया गया उनको गांधी जी और उनके सहयोगियों ने गुमनाम रखा है।गांधी जी नोआखली के दौरे पर न निकले होते तो मनु, आभा और सुशीला नैयर के नाम भी सामने नहीं आते। 1८ वर्षीय मनु गांधी जिनका लालन-पालन गांधी जी की देखरेख में हुआ था और जो उनके भतीजे की बेटी थी, नोआखली के हिंसक वातावरण में गांधी जी के प्रयोग की कसौटी बनी। गांधी जी ने घोषित किया यदि मैं ब्रह्मचर्य पर पूरी विजय पा जाऊँ तो 'मैं जिन्ना को इसमें पाकिस्तान बनाने में परास्त कर दूँगा।'

यह हाड-मांस की स्त्री वैसे ही यौन-इच्छा रहित थी जैसी कि गांधी जी ने वर्णित की तब अपने हर 'प्रयोग' के बाद वे अपने बिस्तर पर लेटने वाली स्त्री से यह क्यों जानना चाहते थे कि उसके अन्दर कोई इन्द्रिय भावना तो नहीं जागी।' 'कोई कुविचार तो मन में नहीं आया? स्त्री के नकारात्मक उत्तर से वे तुरन्त संतुष्ट क्यों हो जाते थे? कैसे मान लिया जाय कि जब वस्त्रहीन स्त्री उनके शरीर के कंपन को रोकने के लिए रात में (गांधी जी का शरीर कई बार कंपन का शिकार हो जाता था) उन्हें अपनी बाहों में समेटती थी तो भीतर से सर्वथा निर्विकार बनी रहती थी? यदि सब भावनाविहीन कठपुतलियाँ थीं तो इनमें से कइयों का मानसिक संतुलन क्यों बिगड़ गया?

गांधी जी के निकटतम सहयोगी उनसे इस बात से सहमत नहीं थे कि इन प्रयोगों से स्त्रियों में कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी या उनको किसी प्रकार की हानि नहीं भरनी पड़ रही थी। निर्मल कुमार बोस जो नोआखली में गांधी जी के साथ थे, प्रयोगों का माध्यम बनायी गयी स्त्रियों की मानसिक दुर्दशा के प्रति उदासीन नहीं रह पाये। विक्षुब्ध होकर उन्होंने गांधी जी के साथ इस विषय पर कई बार मौखिक और पत्रों द्वारा बहस की। प्रयोगों से इन स्त्रियों का व्यक्तित्व कैसे छिन्न-भिन्न हो रहा था इससे गांधी जी को अवगत कराना उन्होंने अपना कर्तव्य समझा। गांधी जी ने उनसे असहमत होते हुए उत्तर दिया- 'अ, ब, स की हिस्टिरिया की बीमारी का मेरे प्रयोगों से कोई संबंध नहीं है। प्रयोग के बाद आज वे वैसी ही हैं जैसे पहले थीं।' सच्चाई कुछ और थी। इन तनावग्रस्त स्त्रियों की दबी यौन-इच्छा बापू की निकटता पाने की स्पर्धा में बदल गयी। बोस ने ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख किया है। एक बार सुशीला नैयर की उनके साथ चलने की जिद पर क्रोधित होकर गांधी जी अपना माथा ठोंककर रोने लगे थे। इन स्त्रियों के तनाव से जो वातावरण खड़ा हुआ उससे गांधी जी अछूते नहीं रह सके। बोस ने गांधी जी को लिखा 'उसके विरुध्द (स्त्री का नाम नहीं दिया है) मेरा यह आरोप है कि वह ब्यूरोक्रेटिक हो गयी है और ऐसी घड़ी में आपके समय का अधिकांश भाग ले रही है, जब राष्ट्रहित के लिए आपकी एकाग्र सेवाओं की आवश्यकता है। मैंने देखा कि- 'हर बार वह आपके पास होती थी, आपका मन अशांत हो जाता था। इससे आपकी कार्यक्षमता में निश्चित रूप से बाधा आती थी।'

गांधी जी के प्रयोगों में जो स्त्रियाँ सम्मिलित हुईं उन्होंने ऐसा स्वेच्छा से और समझ-बूझकर नहीं किया था। भावनात्मक रूप से उन पर निर्भर होने के कारण उन्होंने उनकी आज्ञा का पालन मात्र किया था। आभा गांधी का यह कथन ध्यान देने योग्य है- 'यह सभी को पता था कि सुशीला नैयर बापू के साथ सोती थी। मुझे पहली बार जब सोने को कहा गया तो मैं सोलह वर्ष की थी। मैंने सोचा रात में उनको सर्दी लगती है, उन्हें गरम रखने के लिए मुझे सोने के लिए कहा गया है, दो साल के बाद नोआखाली में मैं नियमित रूप से उनके साथ सोती थी।' गांधी जी की इन स्त्रियों के सामाजिक संबंध भी अप्रभावित नहीं रहे। काका कालेलकर के पुत्र ने सुशीला नैयर की गांधी भक्ति से पीड़ित होकर उनके साथ अपनी सगाई तोड़ दी। भावी पत्नी की गांधी भक्ति के कारण विवाहित जीवन का समन्वय उन्हें असंभव सा लगा। आभा गांधी के पति भी इन प्रयोगों से दुखी थे। इस मामले को लेकर उनकी और उनके मित्रों की गांधी जी से नोंक-झोंक भी हुई। उन लोगों का सम्मिलित निवेदन था- 'बापू आप प्रसिध्द महात्मा हैं। आपको इस आपत्तिजनक ढंग से अपनी परीक्षा नहीं लेनी चाहिए। ऐसी परीक्षा मैथुन-क्षम युवक के लिए अधिक उपयुक्त है। 'बापू ने उन सबको सुना, कुछ कहा नहीं' और अपने प्रयोगों को जारी रखा। राष्ट्रीय जीवन में गांधीजी की महत्ता ने इन साधारण लोगों को नैतिक रूप से बौना बना दिया था। अपने प्रतिवाद को वे खुले मैदान में लाने का साहस नहीं जुटा पाए। सुशीला नैयर के अनुसार इन प्रयोगों का ब्रह्मचर्य से कोई संबंध नहीं था। जब वह गांधी जी के बिस्तर पर लेटती थी, तब बापू प्राय: उनसे पीठ दबाने को कहते थे। कभी-कभी दबाव डालने के लिए पीठ पर लेट जाती थी, आरम्भ में इसे ब्रह्मचर्य का प्रयोग कहने का कोई प्रश्न नहीं उठता है। यह केवल प्राकृतिक चिकित्सा का हिस्सा था। बाद में जब लोगों ने (स्त्रियों के साथ) मनु के साथ, आभा के साथ, मेरे साथ- उनके शारीरिक स्पर्श को लेकर सवाल पूछने शुरू किये (तब) ब्रह्मचर्य का आदर्श का प्रतिपादन किया गया।

गांधी जी का आश्रम प्रयोगशाला की तरह था जिसमें तरह-तरह के प्रयोग किये गये। किन्तु स्त्रियों को लेकर जो भी प्रयोग किये गये उन सभी में उनकी संवेदनहीनता और निष्ठुरता स्पष्ट प्रकट होती है। अपने शैया प्रयोग के पहले ब्रह्मचर्य को नापने-जोखने की प्रक्रिया विकसित करने के कई प्रयोग दूसरों पर किये। दक्षिण अफ्रीका में किये गये एक प्रयोग का वर्णन स्वयं गांधी के शब्दों में- 'यह मेरा प्रयोग था। मैंने उन लड़कों को जो शैतानी के लिए जाने जाते थे, भोली युवा लड़कियों के साथ एक ही स्थान पर, एक ही समय में नहाने के लिए भेज दिया। मैंने उन बच्चों को आत्मसंयम का कर्तव्य भली प्रकार समझा दिया था, बच्चों को नहाने के लिए मिलने देना और आशा करना कि वे निष्पाप बने रहेंगे क्या मूर्खता की बात थी? मेरी ऑंखे लड़कियों पर वैसे ही लगी रहती थीं जैसे एक माँ की बेटी पर।' एक दिन किसी ने आकर गांधी जी को खबर दी कि लड़के दो लड़कियों का विशेषकर और बाकी लड़कियों का भी मजाक उड़ाते हैं। गांधी जी लिखते हैं- 'इस खबर से मैं काँप गया, मैंने युवकों को डाँटा। किन्तु यह पर्याप्त नहीं था। मैं चाहता था कि चेतावनी के नाते उन लड़कियों के शरीर पर कुछ चिह्न हों, ताकि किसी भी युवक की कुद्रष्टि उन पर न पड़े और हर लड़की के लिए एक सबक हो कि कोई भी उसकी शुचिता पर हमला करने का साहस न कर पाए। लड़कियाँ कौन सा चिह्न धारण करें जो उन्हें सुरक्षा की भावना देने के साथ-साथ पापी की ऑंखों को भी निस्तेज कर दे? इस प्रश्न ने मुझे रात भर जगाए रखा। प्रात: मैंने लड़कियों को परामर्श दिया कि वे मुझे अपने लंबे बाल काटने दें, लड़कियों ने मेरी बात नहीं सुनी। मैंने बड़ी उम्र की लड़कियों को स्थिति पहले ही समझा दी थी। उन्हें मेरी भावना पर संदेह नहीं था, पर मेरे परामर्श पर विचार करने के लिए वे तैयार नहीं थीं। अंतत: उन्होंने मुझे अपना समर्थन दे दिया।' बाल काटने का सरल समाधान गांधी जी ने एक विपरीत संदर्भ में भी लागू किया। अपने 20 वर्षीय पुत्र के साथ एक विवाहित स्त्री के आपत्तिजनक व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने न केवल दो सप्ताह का उपवास रखा, बल्कि उस विवाहित स्त्री के बाल भी कटवा दिए।

ब्रह्मचर्य के उच्चतम सोपान तक पहुँचने के लिए गांधी जी ने स्त्रियों को किस तरह माध्यम बनाया यह उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट है। पुरुष की कुद्रष्टि का इलाज उन्होंने स्त्री को उस सबसे वंचित करने में पाया जो उसे स्त्री की पहचान देता है। पारंपरिक समाज में स्त्री के बाल काटना उसका सबसे बड़ा अपमान है। ऐसा दंड उन स्त्रियों को दिया जाता है जो समाज से तिरस्कृत कर दी जाती हैं। यह शरीर को दागने के समान है। हैरानी की बात तो यह है कि जो दंड उन्होंने विवाहित स्त्री को दिया वही निर्दोष भोली युवा लड़कियों को भी दिया। व्यक्तित्वहीन,अस्मिताहीन स्त्री ही गांधी जी के लिए सच्ची स्त्री थी। स्त्री की सहनशीलता को महिमामंडित करके उसके शोषण को उसके स्त्रीत्व की परीक्षा में बदल दिया। उन्हें यह सोचने की आवश्यकता नहीं हुई कि यह तथाकथित सहनशीलता वास्तव में उसकी विवशता है- कस्तूरबा के सामने गांधीजी की आज्ञाओं को शिरोधार्य करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। जिस स्त्री में प्रकृतिजन्य भावनाएँ हैं, जो स्त्री प्रतिवाद के स्वर से परिचित है, जिसकी कोई अस्मिता है, उसको गांधी जी ने समूची स्त्री जाति से बहिष्कृत कर दिया। मानो वह स्त्री नहीं कुछ और है। इस कुछ और को पारंपरिक समाज डायन, कुलटा आदि उपाधियों से विभूषित करता है। गांधी जी ने इन शब्दों का प्रयोग तो नहीं किया है, पर उनका आशय कुछ भिन्न नहीं था।
This post is taking by Upadesh Saxena's blog...Actually I am not a cheater.I dont know how to make a link or say Sabhar to releted Blogger. My intension is only to Pramote this post through my Blog.. Sorry Updesh Sir... I am extreamly very Soory to Hurt you.... Asha hai aap mujhe samajh payenge aur maaf Kar denge....
I am realy a great fan of your Sir.........

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

..क्योंकि न्यूज चैनलों के लिए नक्सली ब्रांड नहीं हैं

जितने कैमरे, जितनी ओबी वैन, जितने रिपोर्टर और जितना वक्त सानिया-शोएब निकाह को राष्ट्रीय न्यूज चैनलों में दिया गया, उसका दसवां हिस्सा भी दंतेवाडा में हुये नक्सली हमले को नहीं दिया गया। 6 अप्रैल की सुबह हुये हमले की खबर ब्रेक होने के 48 घंटे के दौर में भी नक्सली हमलों पर केन्द्रित खबर से इतर आएशा और शेएब के तलाक को हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनलों ने ज्यादा महत्व ही नहीं दिया बल्कि अगुवाई करने वाले टॉप के राष्ट्रीय न्यूज चैनलो ने यह भी जरुरी नहीं समझा कि दिल्ली से किसी रिपोर्टर को दंतेवाडा भेज ग्राउंड जीरो की वस्तुस्थिति को सामने लाया जाए। जबकि आएशा की शादी का जोड़ा कहां बना और निकाह के बाद कितनी रातें आएशा के साथ शोएब ने बितायी होंगी और बच्चा गिराने तक की हर अवस्था को पकड़ने में लगातार हर न्यूज चैनल के रिपोर्टर न सिर्फ लगे रहे बल्कि स्क्रीन पर भी ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी के साथ यह तमाम किस्सागोई चलती रही।

दूसरी ओर नक्सली हमले के बाद हमले को लेकर न्यूज चैनलो के स्क्रीन पर जो दृश्य खबरों के रुप में उभरा, वह चिदंबरम का था। फिर मारे गये जवानो के परिजनों के दर्द का था। सीआरपीएफ जवानों की मौत से सूने हुये 76 आंगन की कहानियों का सिरा और अंत रोते-बिलखते परिवारो के शोर से ही उभरा। जिन परिस्थितियों में गांव में किसानी छोड़ सीआरपीएफ के हवलदार और कांस्टेबल बन कर एक नयी जिन्दगी मारे गये 76 जवानों में से 63 जवानो ने शुरु की थी, उनकी जिन्दगी के साथ बीते पांच सालो में कई जिन्दगियां जुड़ गयीं, उनके लिये सरकार के पास कोई योजना है भी या नहीं यह हकीकत सानिया-शोएब की किस्सागोई पर हल्की पड़ गयी। खेत खलिहानो में मेहनत कर किसी तरह दसवीं पास कर कन्याकुमारी का कांस्टेबल राजेश कुमार हो या राजस्थान का कांस्टेबल संपत लाल सभी का सच न्यूज चैनलों के पर्दे पर बच्चों, पत्नी, मां-बाप के रोने बिलखने में ही सिमटा। एक लाइन में रखे ताबूत, उन्हीं ताबूतों को सलामी देते गृह मंत्री पी चिदंबरम। चिदंबरम जहां गये कैमरे वहां पहुंचे। नक्सली समस्या में न्यूज चैनलों के लिये चिदंबरम ही ब्रांड हैं, इसलिये गृह मंत्री 76 ताबूत पर भी हावी थे।

न्यूज चैनलों के लिये चिदंबरम ने हर राह आसान की। चिदंबरम की बाइट और कट-वेज को ही नक्सली संकट बताना-दिखाना मान लिया गया। लेकिन सानिया-शोएब-आएशा की किस्सागोई पकड़ने के लिये रिपोर्टर कैमरे सिर्फ हैदराबाद में नहीं सिमटे बल्कि हैदराबाद के बंजारा हिल्स से लेकर दिल्ली में पाकिस्तानी दूतावास और लाहौर से कराची तक की दूरी पाट रहे थे। वैसे, न्यूज चैनल अगर चाहें तो एलओसी के आर-पार के सच को भी टीवी स्क्रीन पर उतार दें। लेकिन ऐसा क्या है कि देश के बीचोंबीच छत्तीसगढ में 76 सीआरपीएफ जवान मारे गये और न्यूज चैनलों की ओबी वैन या कैमरा टीम पहुंचने में भी दस घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया ? पहले छह घंटो में घायल जवानों को राहत तक नहीं पहुंची ? पहले घायल को अस्पताल का सुख 12 घंटे बाद मिला। तो क्या खबर देने के लिये सरकार से लाइसेंस लेने वाले न्यूज चैनलों का यह फर्ज नहीं है कि वह उन परिस्थितियों को बताये, जिससे दोबारा ऐसी स्थितियां ना बने या फिर नक्सली प्रभावित इलाकों में आदिवासियों और सीआरपीएफ की जिन्दगी कैसे कटती है, उसे उभारे।

लेकिन यह सच भी सानिया की मुस्कुराहट और शोएब के तेवर में गायब हो गया। न्यूज चैनल देखते हुये खबरों का सच कोई कैसे जान सकता है, जब उसे पता ही नहीं होगा कि चिंतलनार गांव, जहां नक्सली हमला हुआ, वह इस पूरे इलाके का एकमात्र गांव है, जो छत्तीसगढ सरकार के सलावाजुडुम कार्यक्रम में शामिल नहीं हुआ। इसलिये इस गांव को सरकार ने भी ढेंगा दिखा दिया। यहां न पानी है न बिजली और न प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। स्कूल की इमारतें जरुर हैं लेकिन शिक्षक नहीं हैं। इसलिये स्कूल की इमारत में ही सीआरपीएफ जवान रुके। हमले के वक्त गांव वाले घरों में सिमट गये लेकिन ये वही गांववाले हैं, जिनके पास दो मील दूर से लाया पानी न होता तो जो सात जवान बच गये, वह भी ना बच पाते।

न्यूज चैनल के जरीये खबरों को जानने वाले यह भी कैसे जान सकते हैं कि सीआरपीएफ जवान रात दो बजे से लेकर सुबह दस बजे तक ही ऑपरेशन को ही अंजाम देते हैं क्योकि दस बजे के बाद इन जंगलों में तापमान चालीस डिग्री पार कर जाता है। पानी पूरे इलाके में नहीं है, इसलिये कैंपों में जमा पानी को ही बोतल में बंद कर गीले कपड़ों से लपेट कर चलते हैं। बुलेट प्रूफ जैकेट पहन नहीं सकते क्योंकि गर्मी और जंगल का रास्ता इसकी इजाजत नहीं देता। हर जवान करीब बीस किलोग्राम बोझ उठाये ही रहता है क्योंकि जंगलो में यह बोझ जीवन होता है। इस बोझ का मतलब है एसएलआर, राइफल, एके-47 या 56 , मोर्टार लांचर और ग्रेनेड।

वहीं इन न्यूज चैनलों को देखने वाला हर भारतीय जान चुका है कि आएशा ने शोएब के साथ निकाह के बाद की पहली रात के कपड़े आजतक सहेज कर रखे हैं। और जरुरत पड़ी तो कपड़ों का भी डीएनए टेस्ट हो सकता है। लेकिन सीआरपीएफ जवानों के पानी के बोतल और बूटों के लिये कोई टेस्ट नहीं है। आएशा का फोन-इन लगातार न्यूज चैनलो में चलता रहा। लेकिन सीआरपीएफ के जवानों पर जब संकट आया तो किसी जवान ने किसी चैनल को मोबाइल नहीं लगाया। मारे गये 76 जवानों में से 28 के पास मोबाइल उस वक्त जेब में थे। लेकिन हर जवान की उंगलियां बंदूक के ट्रिगर पर थी, न कि मोबाइल के बटन पर। अली हसन ने जरुर मोबाइल से अपने घर वालों को बताया कि उसकी जान जा रही है और बच्चों का ख्याल रखना। लेकिन यह सब न्यूज चैनल के स्क्रीन पर नहीं है।

दिल्ली से जगदलपुर-रायपुर और फिर दिल्ली तक न्यूज चैनलों का कैमरा अगर घूमा तो उसकी वजह चिदंबरम और रमन सिंह ही रहे, जो न्यूज चैनलों के लिये ब्रांड हैं। इसलिये जब एक ब्रांड ने इस्तीफे की बात कही तो दूसरे ब्रांड ने बिना देर किये इस्तीफे को बेकार करार दिया और जवानों के लिये मौत के बाद का जीवन का फिर यही चिदंबरम और रमन सिंह बन गये। क्योंकि जवान की मौत तब तक मायने नहीं रखती जब तक कोई मंत्री न पहुंचे। न्यूज चैनल के दर्शक कैसे जानेंगे कि जवानों की मौत इतनी सामान्य है कि चिंतलनार में नक्सली हमले की पहली जानकारी सुबह 6.10 पर दोरणापार के एसडीपीओ ओम प्रकाश शर्मा को मिली तो उन्होंने भी इसे सामान्य घटना माना। सामान्य का मतलब है बारुदी सुरंग का फटना और दस-बारह जवानों का मरना। और इतनी मौतों पर कोई विधायक भी नहीं आता है। हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनलों के जरिये कैसे दर्शक जान पायेगा कि चिंतलनार से 185 किलोमीटर दूर जगदलपुर में सीआरपीएफ की 62 वीं बटालियन के बचे जवानो में गुस्सा पनप रहा है कि राजनेता और दिल्ली के एसी कमरो में बैठे नौकरशाह बयान दे रहे हैं कि जवान गलत रास्ते पर निकल पड़े इसलिये नक्सली हमला हो गया। बचे जवानों में गुस्सा है कि उन्हें बताया गया है कि आपात जरुरत के लिये चौपर मौजूद है, लेकिन जब जवान खून से लथपथ हो गये तो उनकी सुध लेने के लिये चौपर नहीं था।

दर्शकों को कौन दिखायेगा कि जंगलों में सीआरपीएफ जवान जहां रुकते हैं, पहले उसे चंद घंटों के लिये आराम करने लायक बनाते हैं। बमुश्किल जगह मिलती है, और उसे रुकने लायक बनाते बनाते अगले पड़ाव के लिये निकलने का वक्त आ जाता है। क्योकि कमांडेंट को उपर से आदेश है....रिजल्ट चाहिये। लेकिन न्यूज चैनलो पर यह सच नहीं दिखाया जा सकता क्योंकि गृह मंत्रालय की एडवाइजरी है- नक्सल समस्या को सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से न जोड़ें। मगर सानिया -शोएब के निकाह पर सरकार की कोई एडवाजरी नहीं है क्योंकि ये ब्रांड हैं।

BSP leader's murder caught on camera

LUCKNOW: In a daring murder, a village pradhan and husband of a sitting district panchayat member was shot dead from a point blank range within the district collectorate in Gonda in full public view on Wednesday evening. The victim was sitting on the stage with a dozen others at a public meeting organised to observe the Baba Saheb Bhim Rao Ambedkar's birth anniversary, when the incident took place.

Despite a crowd of over 500 persons, including collectorate staff and police, present at the venue, the lone assailant reportedly pumped in two bullets from behind and escaped unchallenged. A couple of policemen present in the vicinity of the scene of crime, however, reached the site well after the assailant had escaped and rushed the victim to hospital where he was declared brought dead.

Reports reaching the director general of police (DGP) headquarters said that the middle-aged victim - Hanuman Saran Shukla - a BSP leader and pradhan of Mahengipurwa village under Tarabganj police station of Gonda district, had come to attend the function being held within the collectorate compound near Ambedkar crossing. He was sitting on the stage along with his wife - a sitting member of district panchayat as other guests were addressing the gathering when two sounds of gunshots filled the air.

Though initially none could understand what had happened, a couple of seconds later Hanuman slumped on the stage floor and people around him noticed a youth carrying a handgun, fleeing the scene when it dawned upon them as to what had happened. Chaos prevailed thereafter as people in the audience tried to escape leading to a virtual stampede. Hanuman was then rushed to district hospital by two constables who arrived at the scene shortly thereafter but the effort proved futile as the doctors at the district hospital pronounced him dead upon arrival.

Though senior police officers rushed to the site immediately after the news of the sensational crime came in, there was nothing much with the police with regards to the motive for the murder or the identity of the assailant, till late on Wednesday evening. Police were however quick to announce that the slain pradhan had a criminal past. Exact details of the cases in which Hanuman was allegedly involved in, were being collected, Gonda police said.

तुम जो कहो वह सब सही, हम जो कहें वह सब गलत

अम्बेडकर जयन्ती समारोह के दौरान गोण्डा में बसपा के मंच पर पार्टी के पदाधिकारी हनुमान शरण शुक्ला की सरेआम हत्याकर दी गई।
इसी के बाद पार्टी की ओर से बढ़ चढ़ कर सफाई अभियान शुरू हुआ। मज़े की बात यह है कि इसके लिये प्रमुख सचिव ग्रह कुवंर फतेह बहादुर तथा डी0 जी0 पी0 करम वीर सिंह मैदान में उतर गये और प्रेस-कान्फ्रेन्स में इस प्रकार बोले जैसे पार्टी-प्रवक्ता बयान दें। उन्हों ने मृतक के संबंध में कहा कि वह न तो बसपा का सदस्य था और न ही वह पार्टी की किसी समिति से जुड़ा था, वह हिस्ट्रीशीटर था, उसकी हत्या रंजिश में की गई। जब यह सवाल हुआ कि बसपा से नहीं जुड़ा था और तो मंच पर कैसे बैठा था ? और हथियार बंद लोग मंच तक कैसे पहुँचे ? इन के उत्तरों के लिये अधिकारी-गण बग़लें झांकने लगे।
अब दुसरा बयान मृतक की पत्नी पंचायत सदस्य मंजु देवी तथा पुत्री प्रियंका शुक्ला का देखिये-पत्नी ने बताया कि वे बसपा ब्राह्मण भाई चारा समिति के तरब गंज विद्यान सभा क्षेत्र के अघ्यक्ष थे, उनको यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वे ब्राह्मण समाज को बसपा के पक्ष में एकजुट करें। यह भी बताया की वह जयन्ती के मौके पर तीन सौ से अधिक गाड़ियों द्वारा हजारों लोगों को लेकर गये थे। पत्रकारों से बातचीत में रूँधे गले और बह रहे आसुंओ के बीच कहा कि दुःख की घड़ी में शासन उन्हें बसपा कार्यकर्ता न होने की बात कहकर उनके ज़ख्मों को कुरेद रहा है। पुत्री ने कहा कि बसपा के प्रत्येक र्कायक्रम में उनकी बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी थी।
दोनों बयानों की तौल-नाप आप खुद करें। मैं तो बस मृतक की पत्नी और पुत्री को यह कहूँगा कि वे बहन कु0 मायावती और शासन प्रशासन के गुरगों को मुखातिब करके यह शेर पढ़ दें-

बात तुम्हारी आज तक कोई हुई है कब गलत?
तुम जो कहो वह सब सही, हम जो कहें वह सब गलत।