जिस गौरव का नित धयान रहे,
हम भी है कुछ यह ज्ञान रहे .
सब जाये अभी पर मान रहे ,
मरणोत्तर गुंजित यह गन रहे .......
निज गौरव और स्वाभिमान की बात करने वाली ये पंक्तिया राष्ट्रवादी कवी राम धारी सिंह दिनकर के अलावा कौन लिख सकता है . जिनका जन्म २३ सितम्बर, १९०८ को बिहार के बेगुसराई के सिमरिया गाव में हुआ था। दिनकर जी अपने युवा दिनों में भगत सिंह और आजाद के विचारो से प्रभावित थे ।
समर शेष है, जनगंगा को खुलकर लहराने दो,
शिखरों को डूबने और मुकुटो को बह जाने दो।
पथरीली, ऊँची जमीन है? तो उसको तोड़ेंगे,
समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे।
समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसते तीर,
खंड-खंड हो गिरे विषमता के कलि जंजीर।
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल वैयाध,
जो तटस्थ है, समय लिखेगा इनका भी अपाराध.........
दिनकर जी के कविताए देशप्रेम और देशभक्ति के अपने आप में मिशाल होती है। ये मेरे जैसे तुअच लोगो के कहने के लिए नहीं है।
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