
अगर सड़क अमेरीका के बॉस्टन की हो और ज़िंदगी बिहार के बाराचट्टी की, तो दोनों के बीच जुगलबंदी थोड़ी मुश्किल हो सकती है.
गया से निकलकर जैसे ही झारखंड के राष्ट्रीय राजमार्ग पर पहुंचा, तो अचानक से लगा अमेरिका के बॉस्टन या न्यू इंग्लैंड इलाक़े में पहुंच गया हूं अक्तूबर के महीने में.
उन दिनों वहां की चौड़ी-चिकनी सड़कें मानो रंगों में नहाई होती हैं. पत्तों के रंग ऐसे लगते हैं मानो ऊपरवाले ने स्वर्ग से लाखों रंग-भरी पिचकारियां दागी हैं.
मार्च में झारखंड टेसू के रंगों में लिपटा होता है. बल खाती हुई मख्खन सी इन सड़कों के किनारे किनारे पलाश के ये फूल सुहागरात के बिस्तर के इर्द-गिर्द लटकी वेणियों की तरह नज़र आते हैं.
ज़ुबान पर अचानक एक बात आती है - ये सड़कें कहीं और की लगती हैं.
कंप्यूटर की भाषा का इस्तेमाल करूं तो लगता है जैसे किसी ने Ctrl C दबाकर Ctrl V वी दबा दिया है यानि कॉपी और पेस्ट.
जी हां, ये सड़कें कहीं और की लगती हैं.
क्योंकि जैसी ही गाड़ी थोड़ी आगे बढ़ती है. किनारे नज़र आते हैं टूटे पुराने घर, जंगल से लकड़ी के गठ्ठर लेकर आती औरतें, सड़क के बीचोंबीच खूंटे से निकलकर भागी बकरी, खेलते हुए अधनंगे बच्चे...किस्मतवाले क्योंकि उन्हीं की उम्र का एक बच्चा बगल के ढाबे में प्लेंटें धो रहा है. उसके खेलने के दिन अभी से ही ख़त्म हो गए.
सड़क के बीचोबीच घिसटता हुआ नज़र आता है एक भिखारी जो शायद इन्हीं सड़कों पर अपनी दोनों टांगे खो चुका है. लाल जामे में लिपटी एक अंधी औरत आंचल फैलाकर मांग रही है कुछ पैसे. उसके लिए रूकते हुए किसी को नहीं देखा मैने.
सड़क ने मानो चीरा लगा दिया है लोगों के घरों और खेतों के बीच. एक ओर घर हैं दूसरी ओर मालिकों के खेत.
चार लेन की सड़क पार करना आसान नहीं...लेकिन भूखे पेट सोना और मुश्किल. ट्रकों की रफ़्तार इतनी तेज़ की गरीब की हड्डियां अक्सर बिखरती रहती हैं.
जहां गांव की सुकून से चलती हुई पगडंडियाँ इन सड़कों को खरोंचती हैं वहां हर दिन टकराव होते है.
सुना था सड़कों की जात नहीं होती, वर्ग नहीं होता. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. जो इन सड़कों के नखरे नहीं उठा सकता, उसे अपनी नज़र नीची रखनी होगी.
ये सड़कें काबू में तभी आती हैं जब आम आदमी भीड़ में तब्दील हो जाता है. रामनवमी और मुहर्रम पर इन्हें झुकना होता है. चार लेन की अकड़ दो लेनों में बदल जाती है. हवा से बातें करनेवाली मोटरगाड़ियां सहम कर रेंगना शुरू कर देती हैं.
यकीन मानिए अमेरीका हो या जर्मनी, चीन हो या ब्रिटेन, राजमार्गों पर जुलूस निकलते न कहीं देखा न कहीं सुना. ऐसा बस भारत में हो सकता है. क्योंकि यहां ऐसा नहीं हुआ तो उसे ग़लत माना जाता है.
ये सड़कें भारत को बहुत दूर ले जाने के लिए बनी हैं. लेकिन लोगों को उन पर चलने के काबिल भी बनाना होगा. दोनों के बीच फ़ासला अभी बहुत बड़ा है.
दिल्ली के जनपथ पर गोरी विदेशी लड़कियां जब आती हैं तो उनकी और सभी की नज़र खींच जाती हैं...कभी लिबास के कारण तो कभी इसलिए कि वो भीड़ से अलग नज़र आती हैं. इन सड़कों का भी कुछ ऐसा ही है...बला की ख़ूबसूरत हैं, कभी चिढ़ाती हैं कभी उम्मीदें जगाती हैं लेकिन अभी मिलन मुश्किल लगता है.
ये सड़कें कहीं और की लगती हैं.
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