शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

‘इसलाम आज इतिहास की सबसे बड़ी समस्या है’



This is not my own view.Here are a interview of a dutch Writer.....


डच लेखिका और राजनीतिज्ञ अयान हिरसी अली वाशिंगटन डीसी स्थित अमेरिकन इंटरप्राइज इंस्टीट्यूट की फेलो हैं. उनकी ‘इनफिडेल’ नामक संस्मरणों की किताब काफी चर्चा में रही है. इसलाम की आलोचनाओं के कारण कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं हिरसी हाल ही में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल हुईं. सुरक्षा कारणों से उनके आने की पहले से कोई सूचना नहीं दी गई थी. गौरव जैन से उनकी बातचीत के प्रमुख अंश:

क्या आपको लगता है कि इसलाम की सार्वजनिक तौर पर आलोचना से पहले इसलाम से अलग होना जरूरी है?

इसलाम से बाहर आने का मेरा सफर यह दिखाता है कि निजी तौर पर किसी मुसलिम मर्द या औरत के लिए अपने विचारों में बदलाव लाना मुमकिन है. मुझे यह सहज और सरल भाषा में साफ करना पड़ता है कि मेरे मां-बाप ने मुझे नैतिक मूल्यों का यह ढांचा दिया था, मैंने इसलिए इसे छोड़ दिया और ये हैं वे नए नैतिक मूल्य जो मैंने अपनाए हैं. अगर आप खुद ही इस बारे में साफ नही हैं और भ्रम में पड़ गए तो आपका मकसद पूरा नहीं हो पाएगा और यह केवल कट्टरपंथियों को ही फायदा पहुंचाएगा, क्योंकि उनका नजरिया और इसलाम को फैलाने का उनका मकसद बहुत साफ है. वे आपको बताते हैं कि यह हलाल है, यह हराम है. आपको काफिरों से लड़ना चाहिए और अगर वे अपनी इच्छा से धर्म नहीं बदलते तो उन्हें मार डालो या उनसे बचो. पतितों के लिए इस तरह की शर्तें हैं. वे इस बारे में बहुत साफ हैं कि आपको इसलाम क्या करने को कहता है. इसलिए आपको एक साफ रुख अपनाते हुए बताना होगा कि वे मूल्य क्यों गलत हैं.

क्या आप इसलाम के प्रसार को एक समस्या के तौर पर देखती हैं?

आज यह इतिहास की सबसे बड़ी समस्या है. अगर हम आतंक और हिंसा को छोड़ भी दें तब भी. यह एक बंद दिमाग का आदमी पैदा करता है, क्योंकि यह आपको खुद सोचने की इजाजत नहीं देता. आपको एक आदमी का अनुसरण करना होता है जो आपको हराम और हलाल चीजों के बारे में बताता है. इसलाम मौत के बाद की फिक्र करने को कहता है. जबकि जरूरी यह है कि हम जिंदगी के लिए एक दर्शन की रचना करें, उस जिंदगी के लिए जो आज सामने है. मुसलिम जगत इसलिए पीछे है क्योंकि वह आज की बजाय मौत के बाद के जीवन और कयामत के बारे में चिंतित रहता है.

आज बुरका बड़ी समस्या क्यों है?

पश्चिम में जब भी बुरके की चर्चा होती है, दुर्भाग्य से बहस को कपड़े के एक टुकड़े तक सीमित कर दिया जाता है. जैसे कि आपको अपने बाल या आंखें ढकनी चाहिए या नहीं वगैरह. जबकि हमें इसके असली निहितार्थ के बारे में बात करनी चाहिए. बुरके के पीछे का विचार यह है कि नारी शरीर लुभावना है, यह मर्द की काम भावना को उकसाता है. और अगर ऐसा होता है तो मर्द खुद पर काबू नहीं रख सकता. इसलिए सबसे अच्छा तरीका है कि औरत को ही ढक दो. अब जो औरतें जो इसे गर्व से पहनती हैं वे खुद से पूछें -क्या किसी मर्द को उसकी काम भावना से बचाना मेरी जिम्मेदारी है या उसे खुद अपनी इच्छाओं और तकाजों पर काबू रखना सीखना चाहिए? अब जैसा कि हम भारत, चीन, पश्चिम में देख रहे हैं, मर्द अपने तकाजों को नियंत्रित करने में सक्षम हो रहे हैं और इस तरह बुरका निरर्थक बन रहा है. एक दूसरी वजह यह है कि आप देखेंगे कि एक राजनीतिक नजरिए की अभिव्यक्ति के रूप में मुखर, शिक्षित कामकाजी औरतें भी बुरका पहनती हैं. यह राजनीतिक नजरिया यह है कि इसलाम एक राजनीतिक सिद्धांत है, यह सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत है और शरिया कानून लागू होना चाहिए. यह खुद को एक झंडे से ढकने जैसा है, यह एक भव्य आडंबर है.

यूरोप में मुसलमानों के तुष्टीकरण की तुलना अमेरिका से कैसे करेंगी?
अमेरिका और यूरोप के मुसलमानों में फर्क यह है कि अमेरिकी मुसलमानों का शैक्षिक स्तर यूरोप के मुकाबले बेहतर है. लेकिन तब भी अमेरिका में उग्रवाद और जिहादीपन अधिक है, जो यहां खुल रहे इसलामी सेंटरों के रूप में दिखता है. इसलाम में दो समूह हैं. एक हिंसा को भी साधन मानता है. उधर, तारिक रमजान जैसे लोग क्रमिकवाद में यकीन रखते हैं-अपने उद्देश्यों को लोकतांत्रिक तरीकों से हासिल करने में. मुझे लगता है कि अल कायदा हिंसा का इस्तेमाल करना जारी रखेगा और यह रास्ता इसलाम के लिए आत्मघाती है.

ये सड़क कहीं और की लगती है


अगर सड़क अमेरीका के बॉस्टन की हो और ज़िंदगी बिहार के बाराचट्टी की, तो दोनों के बीच जुगलबंदी थोड़ी मुश्किल हो सकती है.

गया से निकलकर जैसे ही झारखंड के राष्ट्रीय राजमार्ग पर पहुंचा, तो अचानक से लगा अमेरिका के बॉस्टन या न्यू इंग्लैंड इलाक़े में पहुंच गया हूं अक्तूबर के महीने में.

उन दिनों वहां की चौड़ी-चिकनी सड़कें मानो रंगों में नहाई होती हैं. पत्तों के रंग ऐसे लगते हैं मानो ऊपरवाले ने स्वर्ग से लाखों रंग-भरी पिचकारियां दागी हैं.

मार्च में झारखंड टेसू के रंगों में लिपटा होता है. बल खाती हुई मख्खन सी इन सड़कों के किनारे किनारे पलाश के ये फूल सुहागरात के बिस्तर के इर्द-गिर्द लटकी वेणियों की तरह नज़र आते हैं.

ज़ुबान पर अचानक एक बात आती है - ये सड़कें कहीं और की लगती हैं.

कंप्यूटर की भाषा का इस्तेमाल करूं तो लगता है जैसे किसी ने Ctrl C दबाकर Ctrl V वी दबा दिया है यानि कॉपी और पेस्ट.

जी हां, ये सड़कें कहीं और की लगती हैं.

क्योंकि जैसी ही गाड़ी थोड़ी आगे बढ़ती है. किनारे नज़र आते हैं टूटे पुराने घर, जंगल से लकड़ी के गठ्ठर लेकर आती औरतें, सड़क के बीचोंबीच खूंटे से निकलकर भागी बकरी, खेलते हुए अधनंगे बच्चे...किस्मतवाले क्योंकि उन्हीं की उम्र का एक बच्चा बगल के ढाबे में प्लेंटें धो रहा है. उसके खेलने के दिन अभी से ही ख़त्म हो गए.

सड़क के बीचोबीच घिसटता हुआ नज़र आता है एक भिखारी जो शायद इन्हीं सड़कों पर अपनी दोनों टांगे खो चुका है. लाल जामे में लिपटी एक अंधी औरत आंचल फैलाकर मांग रही है कुछ पैसे. उसके लिए रूकते हुए किसी को नहीं देखा मैने.
सड़क ने मानो चीरा लगा दिया है लोगों के घरों और खेतों के बीच. एक ओर घर हैं दूसरी ओर मालिकों के खेत.

चार लेन की सड़क पार करना आसान नहीं...लेकिन भूखे पेट सोना और मुश्किल. ट्रकों की रफ़्तार इतनी तेज़ की गरीब की हड्डियां अक्सर बिखरती रहती हैं.


जहां गांव की सुकून से चलती हुई पगडंडियाँ इन सड़कों को खरोंचती हैं वहां हर दिन टकराव होते है.

सुना था सड़कों की जात नहीं होती, वर्ग नहीं होता. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. जो इन सड़कों के नखरे नहीं उठा सकता, उसे अपनी नज़र नीची रखनी होगी.
ये सड़कें काबू में तभी आती हैं जब आम आदमी भीड़ में तब्दील हो जाता है. रामनवमी और मुहर्रम पर इन्हें झुकना होता है. चार लेन की अकड़ दो लेनों में बदल जाती है. हवा से बातें करनेवाली मोटरगाड़ियां सहम कर रेंगना शुरू कर देती हैं.

यकीन मानिए अमेरीका हो या जर्मनी, चीन हो या ब्रिटेन, राजमार्गों पर जुलूस निकलते न कहीं देखा न कहीं सुना. ऐसा बस भारत में हो सकता है. क्योंकि यहां ऐसा नहीं हुआ तो उसे ग़लत माना जाता है.

ये सड़कें भारत को बहुत दूर ले जाने के लिए बनी हैं. लेकिन लोगों को उन पर चलने के काबिल भी बनाना होगा. दोनों के बीच फ़ासला अभी बहुत बड़ा है.

दिल्ली के जनपथ पर गोरी विदेशी लड़कियां जब आती हैं तो उनकी और सभी की नज़र खींच जाती हैं...कभी लिबास के कारण तो कभी इसलिए कि वो भीड़ से अलग नज़र आती हैं. इन सड़कों का भी कुछ ऐसा ही है...बला की ख़ूबसूरत हैं, कभी चिढ़ाती हैं कभी उम्मीदें जगाती हैं लेकिन अभी मिलन मुश्किल लगता है.

ये सड़कें कहीं और की लगती हैं.

पाकिस्तान पहुँचीं सानिया


भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा अपने पति और पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के साथ भारत से पाकिस्तान पहुँच गई हैं.
पति और पत्नी जब मुंबई से कराची पहुँचे तो जिन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सिंध प्रांत के खेल मंत्री मोहम्मद अली शाह, मुख्यमंत्री के सलाहकार राशिद रब्बानी, वक़ार मेहदी सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों ने उनका भव्य स्वागत किया.

सानिया ने पत्रकारों को बताया कि वे पहली बार कराची पहुँची हैं और उन्हें यहाँ पहुँच कर बहुत अच्छा लगा रहा है.

खेल मंत्री ने नव विवहित जोड़े को फूल और सिंधी अजरक यानी चादर तोहफ़े में दी. सानिया और शोएब जब विमान से उतरे तो उस समय हज़ारों लोग दोनों की एक झलक देखने केलिए बेताब थे.

बड़ी संख्या में लोग हवाई अड्डे पर पहुँचे. सुरक्षा व्यवस्था के कड़े प्रबंध किए गए थे और पत्रकारों सहित किसी को भी शोएब और सानिया से मिलने नहीं दिया गया.

लोगों ने दोनों के देखने के लिए काफी कोशिश की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल सकी.

दोनों कुछ घंटे हवाई अड्डे पर रहने के बाद इस्लामाबाद के लिए रवाना हो गए. सानिया के साथ भारत से उनकी माँ भी पाकिस्तान पहुँची हुई हैं.

शोएब ने पत्रकारों को बताया कि वे करीब एक हफ्ते तक पाकिस्तान में रहेंगे जिसके बाद में दुबई जाएँगे.

उधर प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी ने सरकारी अधिकारियों को आदेश दिया है कि सानिया और शोएब को इस्लामाबाद पहुँचने पर विशेष सरकारी अतिथि का दर्जा दिया जाए.

सानिया और शोएब इस्लामाबाद के बाद शोएब के शहर सियालकोट जाएँगे जहाँ 25 अप्रैल को रिसेप्शन होगा.

ग़ौरतलब है कि सानिया और शोएब का निकाह कई विवादों के बाद 12 अप्रैल को हैदराबाद में हुआ था.

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

रंगबाज पूरबियों को ले डूबी रंगदारी


दिल्ली के शातिर शोहदे अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पलते-बढ़ते हैं तो मुंबई के माफिया डॉन पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वाचल) की नर्सरी में आकार लेते हैं. यकीन मानिए, यही सच है. बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध में स्वतंत्रता संग्राम की कमान संभालने वाले व उत्तरा‌र्द्ध में देश को नेतृत्व प्रदान करने वाले अपने उत्तम प्रदेश अर्थात उत्तर प्रदेश की इक्कीसवी सदी की शुरुआत में यही पहचान है. ग्लोबलाइजेशन के दौर में मेच्योरिटी की ओर बढ़ रहा है भारतीय लोकतंत्र. ऐसे में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए पूरबिया प्रोफेशनल क्रिमिनल कम पॉलिटिशियन जनतंत्र का नया मुहावरा गढ़ने में मशगूल हैं. मंडल-कमंडल के झंझावातों को झेल नई जमीन तलाश रहे पूर्वाचल के सामाजिक व्याकरण के सिलेबस में भी आमूल चूल परिवर्तन हुआ है. क्लासिकल सामंतवाद के रंगमंच पर सिर्फ पात्र बदले हैं, पटकथा वही है.
हाल के दिनों के आपराधिक रिकार्डो पर गौर करें तो पता चलेगा कि पूर्वाचल के कई जिले अपराधियों के अभ्यारण्य में तब्दील हो चुके हैं. हर दूसरे-तीसरे दिन यहां कोई न कोई टपका दिया जाता है. गैंगवार के मामले में भी यहां के कई शहर अब मुंबई व सिंगापुर से सीधे ताल ठोक सकते हैं. सर्व विद्या की राजधानी मोक्षदायिनी काशी अब अपने रंगदारों के बूते पहचानी जा रही है. कहते हैं भोले नाथ की नगरी काशी के वासी मिजाज से भौकाली होते हैं. जेब में फुटी कौड़ी न भी हो तो रंगबाजी से बतियाना उनकी फितरत है. किसी जमाने में पूरबिये किसी दिग्गज राजनेता, साहित्यकार या किसी शिक्षाविद् के नाम की धौंस जमाया करते थे. अब किसी न किसी माफिया डॉन तक पहुंच की हेकड़ी बघारते हैं. अंडरव‌र्ल्ड में बढ़ रही उसकी साख किसी भी भले मानुष के पेशानी पर बल डाल सकता है. वैसे यह अंदर की बात है. सच तो यह है कि रंगदारी ने रंगबाज पूरबियों का बंटाधार कर दिया है.
अपने मिजाज की त्रासदी झेल रहा है पूर्वाचल. प्राकृतिक तौर पर अपराधी न होते हुए भी अपने अह्म की तुष्टि के लिए पूरबियों की नई पीढ़ी यदा-कदा कानून हाथ में लेने से गुरेज नहीं करती. इसके बाद कुछ मनबढ़ लंबे हाथ मारने से भी नहीं चुकते. ऐसे ही कुछ युवा अपराध की दलदल में फंसते जा रहे हैं तो कुछ खुद को मॉडर्न दिखाने की ललक में अपराधियों के मोहरे बनते जा रहे हैं. ये रंगबाज दीमक की तरह धीरे-धीरे पूर्वाचल की संपन्नता व व्यापार को चाटते जा रहे हैं. नतीजा आपके सामने है.पूर्वाचल में और उसमें बढ़ते अपराध कोढ़ में खाज का काम कर रहे हैं. हत्या, लूट, रंगदारी, अपहरण व बलात्कार सरीखे वारदातों की बढ़ती तादाद ने पूर्वाचल का इतिहास-भूगोल ही नहीं, अर्थशास्त्र को भी डावांडोल कर दिया है.
इस साल के शुरुआत के तीन महीनों में हत्या व लूट की तकरीबन दर्जन भर वारदातों को अकेले वाराणसी शहर में ही अंजाम दिया जा चुका है. गुजरे साल का लेखा-जोखा तो गोया खून से ही लिखा गया था. हत्या, लूट व अपहरण सरीखी वारदात अब पूर्वाचल के लिए एक आम बात है. ऐसी विषम परिस्थितियों में कोई उद्योगपति या व्यवसायी यहां आकर कारोबार करने के विषय में भला कैसे व क्यों सोचेगा? कई कारणों से पूर्वाचल की अपनी महत्ता है. मगर जिन विषम परिस्थितियों से मुखातिब है पूर्वाचल, दयनीय कानून-व्यवस्था उसकी सारी उपलब्धियों पर पानी फेरने के लिए काफी है. जान है तो जहान है. यहां के समर्थ उद्योगपति व व्यवसायी पलायन को लाचार हैं. जो किन्ही कारणों से पलायन नहीं कर सकते, वे भी पुलिस व प्रशासन के भरोसे नहीं, उन आततायियों के रहमोकरम पर ही रोजी-रोटी कमा रहे हैं, जो उनकी सुपारी हाथ में लिए घूम रहे हैं.
माफिया डॉन सुभाष ठाकुर ने पिछले दिनों एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि आपराधिक प्रतिभाओं के लिहाज से उर्वरा है पूर्वाचल की धरती. सबसे बड़ी बात यहां के युवा अपराधी कम से कम अपने आका से विश्वासघात नहीं करते. यही उनकी पूंजी है. इसीके बूते अंडरव‌र्ल्ड में इस तबके के पूरबियों की धाक है. वैसे पूर्वाचल में बढ़ रहे अपराध का एक अहम कारण भयंकर बेरोजगारी भी है. आईपीएस सुजीत पांडेय ने हाल में दिए एक इंटरव्यू में कहा कि बेरोजगारी पूर्वाचल में बढ़ते अपराध का बुनियादी कारण है. मिजाज से रंगबाज व भौकाली होने के कारण इस क्षेत्र के युवकों का एक तबका व्हाइट कलर जॉब की ताक में रहता है. जाहिर है सभी की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकती. ऐसी हालत में वे छोटे-मोटे व्यवसाय की बजाय शॉर्टकट रास्तों के जरिए फटाफट अपना लक व लुक दोनों बदलना चाहते हैं.
उदार अर्थव्यवस्था व भूमंडलीकरण की बदौलत काशी व उसके आसपास के शहरों में कमाने के जरिए भले न बढ़े हों, सपने व महत्वकांक्षाएं जरूर युवा पीढ़ी के दिल-दिमाग में पैठ बनाईं हैं. इन्हें हासिल करने की ललक के चलते लोगों के खर्चे बेहिसाब बढ़े हैं. संबंधित तबका इन खर्चो को पूरा करने के लिए बेजां हरकतें करने से बाज नहीं आता. गलत संगत में पड़कर कई भले घरों के लड़के घोड़े पर उंगलियां टिकाए यायावरी जीवन बिताने को मजबूर हैं. महज ब्रांडेड कपड़े-जूते, मोबाइल व थोड़े बहुत नोटों के लालच में कई लड़के सत्या ब्रांड शूटर्स बन गए हैं. अब उनके पास सब कुछ है, सिवाय चैन की नींद के. रही सही कसर पूरी कर देता है पड़ोसी राज्य बिहार. न सिर्फ असलहे अपितु कोच भी मुहैया करवाता है बिहार. जरूरत पड़ने पर पुलिस से छिपने के लिए वहां शरण भी उपलब्ध है. वैसे ऐसे तत्वों को संरक्षण प्रदान कर अपना उल्लू सीधा करने से पूर्वाचल के राजनेता भी बाज नहीं आते. जी हां, पूर्वाचल की बिगड़ी तबीयत के लिए कई कारक ग्रह मौजूद है. विडंबना तो यह है कि काशी समेत समूचे पूर्वाचल की तीमारदारी का अहम दायित्व जिन्हें सौंपा गया है, उनमें से कई जनप्रतिनिधियों का टांका सीधे अंडरव‌र्ल्ड से जुड़ा है. जो सीधे नहीं जुड़े हैं, वे भी घुमा फिरा कर थोड़ी बहुत मोंगाबो को खुश करने की जुगत भिड़ाने की हैसियत रखते हैं. जाहिर है ऐसे हालात में काशी की हिफाजत तो इसके शाश्वत कोतवाल (भैरो बाबा) ही कर सकते हैं.
कोलकाता, दिल्ली, मुंबई हो या मारीशस व त्रिनिदाद, हाड़तोड़ मेहनत के लिए अभ्यस्त पूरबिए जहां भी गए वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन उभरे. लगभग दस साल पहले नई दिल्ली के मावलंकर हाल में अखिल विश्व भोजपुरी सम्मेलन के सालाना जलसे को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने कहा था महानगर ही नहीं, बीहड़ में भी आर्थिक तौर पर स्वावलंबी हो परचम लहराने का माद्दा भोजपुरी भाषियों में है, मगर दीप तले अंधेरे की कहावत चरितार्थ करता है इनका अपना घर, अपना इलाका. क्या वजह है कि यहां की प्रतिभाएं अन्यत्र रंग दिखाती हैं, जबकि यहां लाचार दिखती हैं? ये सवाल अब भी अनुत्तरित है.

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

जब-जब आघात लगा, जब-जब किसी ने पीठ में छुरा घोंपा, तब-तब मैं रोया।


आज की पत्रकारिता
आज की पत्रकारिता में सब कुछ फास्‍ट फूड ज्‍वायंट जैसा हो गया है। धैर्य ‍बिलकुल भी नहीं है। आज के बच्‍चों को ज्‍वाइन करने के तीसरे दिन ही पीएम की बीट चाहिए, क्राइम बीट चाहिए। इसका कारण है कि आजकल बच्‍चों की न तो सैद्धान्‍ति‍क ट्रेनिंग होती है और न ही मानसि‍क। बल्कि नट-वोल्‍ट को फिट करने की ट्रेनिंग होती है। भाषा और पढ़ाई से ज्यादा अब जरूरत इस बात की है कि आपको क्वार्क एक्सप्रेस, फोटो शाप, वीडियो एडिटिंग, वाइस ओवर, लेआउट इत्यादि आता है या नहीं। पत्रकारिता से जन-सरोकार कम होता जा रहा है। मगर हमेशा ऐसा नहीं होगा। अल्टीमेटली, कंटेंट ही रूल करेगा। पत्रकारिता के कई फास्ट फूड ज्वायंट फिलहाल बंदी के कगार पर हैं। चलेगा वही जो टिकेगा और टिकेगा वही जो इस देश की आम जनता और अपने पाठक की बात करेगा।
पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को राष्ट्रपति का एट होम कैसे होता होगा। किस स्तर के लोग वहां बुलाए जाते होंगे। इत्यादि-इत्यादि। जब ये इच्छाएं पैदा हुईं तो अपने अखबार में बेचैनी भी पैदा होने लगी। क्योंकि, इन तमाम जगहों पर, महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ की जाने वाली तमाम यात्राओं में संपादक जी का नाम ही सर्वोपरि होता था।
बाजार का प्रभाव मीडि‍या पर है, इसमें कोई दो-राय नहीं है और बाजार का प्रभाव इसलि‍ए भी पड़ेगा क्‍योंकि एक 16 पृष्‍ठ वाला अखबार बनाने के लिए लगभग 18-20 रुपये का खर्चा आता है और पाठक अखबार खरीदता है 2 या तीन रुपये में। अब इनमें जो 15-16 रुपए का गैप है, उसे बाजार भरता है। बाजार अगर देगा तो लेना भी चाहेगा।
पत्रकारिता में अरुण शौरी ने मुझे बेहद प्रभावित किया। उनके एक इन्‍टरव्‍यू को मैंने पढ़ा जिसमें उनसे किसी ने पूछा था कि खोजी पत्रकारिता क्या है? श्री शौरी का जवाब था कि सरकारी कागजातों के मध्‍य वि‍रोधाभास ढूंढना ही सबसे बड़ी खोजी पत्रकारिता है। वाकई में खोजी पत्रकारिता फावड़े या कुदाल को लेकर नहीं किया जा सकता।
रजनीश में रुचि उनकी सबसे चर्चित पुस्तक ‘संभोग से समाधि की ओर’ से पैदा हुई पर महावीर और कृष्ण पर उनकी पुस्तकों ने उनके प्रति सम्मान का भाव जगाया।
पत्रकारिता में ड्रिंक का महत्‍व इतना है कि यदि‍ आप किसी प्रोफेशनल बैठक में हैं, तो सामने वाला व्‍यक्‍ति‍ आपसे खुलता जाता है। अमूमन हम सब स्वयं से भागने के लि‍ए शराब पीते हैं। शराब आपको कुछ देता-दिलाता नहीं है। लेकिन कुछ भूलने में, सहज होने में मदद जरूर करता है।
कहां तो तय था चि‍रागा हर एक घर के लि‍ए

यहां चराग मयस्‍सर नहीं सहर के लि‍ए’
अगर अख़बार चारण का काम करने लगेंगे तो जनता के सवालों को सरकार तक कौन पहुंचाएगा?
सरकार की योजनाओं और कामों को प्रचारित करने के लिए जनसंपर्क विभाग होता है। हर सरकार यही चाहती है कि उसके अच्छे कामों का प्रचार हो और सरकार की कमज़ोरियां बाहर न आएं. सरकार की विफलताओं और कमजोरियों को जनता के सामने लाना मीडिया का काम है. लेकिन बिहार में स्थिति अलग है. बिहार में अघोषित सेंसरशिप लागू है. पटना के अख़बारों ने नीतीश सरकार की ग़लतियों और बुराइयों को छापना बंद कर दिया है. सरकार के ख़िलाफ़ ख़बर छापने पर अख़बार मालिकों को माफी मांगनी पड़ती है और ख़बर लिखने वाले पत्रकार को सजा मिलती है. बिहार के मीडिया ने सरकार के सामने घुटने टेक दिए हैं और वह जनसंपर्क विभाग की तरह काम कर रहा है.
रूप में छपवाने की कोशिश की, लेकिन फिर भी किसी अख़बार ने उस ख़बर को छापने की हिम्मत नहीं की। बिहार के अख़बारों पर नज़र डालें तो एक अजीबोग़रीब पैटर्न दिखता है. पहले पेज पर सरकार के अच्छे कामों का बढ़ा-चढ़ा ब्यौरा मिलता है, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अच्छी तस्वीर होती है और बाक़ी जगह पर हत्या, बलात्कार और लूट की ख़बरें होती हैं. जितना विकास हुआ नहीं, अख़बार उससे कहीं ज़्यादा ढोल पीटते हैं. नीतीश कुमार के विरोधियों, दूसरे नेताओं और उनके विचारों को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाता है. बिहार के कुछ पत्रकारों से बात करने पर पता चला कि वे राज्य की समस्याओं के बारे में लिखना चाहते हैं, लेकिन उनकी कलम को रोक दिया जाता है. जिस अख़बार में नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ ख़बर छप जाती है, उस अख़बार को सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो जाता है. यह तब तक बंद रहता है, जब तक अख़बार के मालिक बिहार सरकार के मुखिया के पास जाकर गिड़गिड़ाते नहीं हैं.
ज़्यादातर अख़बार और न्यूज़ चैनल चारणों की तरह नीतीश सरकार की शान में क़सीदे ऐसे पढ़ते और लिखते हैं कि जैसे आप बिहार सरकार का चैनल देख रहे हों या फिर बिहार सरकार के पब्लिक रिलेशन डिपार्टमेंट का कोई पर्चा पढ़ रहे हों। इस साल चुनाव होने वाले हैं. नीतीश सरकार अपने पांच साल पूरे करने वाली है, लेकिन इस कार्यकाल के दौरान क्या-क्या कमियां रहीं, यह छापने या दिखाने की हिम्मत कोई भी अख़बार या न्यूज़ चैनल नहीं कर सका. कुछ लोग यह कह सकते हैं कि बिहार सरकार मीडिया को मैनेज कर रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि मीडिया ख़ुद बिकने के लिए बाज़ार में खड़ा है. सरकार को उसे मैनेज करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह ख़ुद मैनेज होने के लिए तैयार बैठा है.
एनडीए की सरकार ने भी शाइनिंग इंडिया के विज्ञापन के नाम पर मीडिया को करोड़ों रुपये दिए थे। उस व़क्त भी अख़बारों और टीवी चैनलों ने चुनाव से पहले एनडीए की सरकार को विजयी घोषित कर दिया था. उस चुनाव का परिणाम क्या निकला, यह भी हम लोगों के सामने है. सरकार के जनसंपर्क विभाग की तरह काम करना बिहार में पत्रकारिता का नया चेहरा है. क्या कारण है कि हड़ताल से बिहार में पूरा तंत्र चरमरा जाता है और अख़बारों में इस ख़बर को अंदर के पन्नों में छोटी सी जगह मिल पाती है. क्यों सरकार के विरोधियों को विलेन के रूप में पेश किया जाता है. नीतीश सरकार ने सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल कर अख़बार मालिकों को लालच दिया और अख़बारों को पालतू बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.]
हार में यह अघोषित सेंसरशिप बहुत ही सुनियोजित ढंग से लागू की गई है और अख़बारों को अपने हित में इस्तेमाल कर उन्हें राज्य सरकार का एजेंट बना डाला गया है. मंदी के दौर में नीतीश सरकार ने मीडिया की कमज़ोरी को भलीभांति समझा और सरकारी विज्ञापन को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया. ऐसे-ऐसे हथकंडे अपनाए गए, जिन्हें हम तानाशाही से जोड़ कर देख सकते हैं. लालू-राबड़ी की सरकार के दौरान बिहार में जंगलराज पर हमेशा कुछ न कुछ ख़बरें छपा करती थीं, लेकिन वर्तमान दौर में ख़बर छापने से पहले इस बात का ख्याल रखा जाता है कि सरकार के मुखिया का राजनीतिक क़द कम न हो जाए. दरअसल, नीतीश सरकार ने मीडिया की कमज़ोरी को पहचान लिया है. और, यह कमज़ोरी है विज्ञापन की. नीतीश सरकार ने विज्ञापनों के सहारे मीडिया को नियंत्रित रखने का काम बख़ूबी किया है. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से साल 2005 से 2010 के बीच (नीतीश कुमार के कार्यकाल के चार सालों में) लगभग 64.48 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिए गए. जबकि लालू-राबड़ी सरकार के कार्यकाल के अंतिम 6 सालों में महज़ 23.90 करोड़ रुपये ही ख़र्च हुए थे.

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

रामधारी सिंह दिनकर

जिस गौरव का नित धयान रहे,
हम भी है कुछ यह ज्ञान रहे .
सब जाये अभी पर मान रहे ,
मरणोत्तर गुंजित यह गन रहे .......
निज गौरव और स्वाभिमान की बात करने वाली ये पंक्तिया राष्ट्रवादी कवी राम धारी सिंह दिनकर के अलावा कौन लिख सकता है . जिनका जन्म २३ सितम्बर, १९०८ को बिहार के बेगुसराई के सिमरिया गाव में हुआ था। दिनकर जी अपने युवा दिनों में भगत सिंह और आजाद के विचारो से प्रभावित थे ।
समर शेष है, जनगंगा को खुलकर लहराने दो,
शिखरों को डूबने और मुकुटो को बह जाने दो।
पथरीली, ऊँची जमीन है? तो उसको तोड़ेंगे,
समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे।
समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसते तीर,
खंड-खंड हो गिरे विषमता के कलि जंजीर।
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल वैयाध,
जो तटस्थ है, समय लिखेगा इनका भी अपाराध.........
दिनकर जी के कविताए देशप्रेम और देशभक्ति के अपने आप में मिशाल होती है। ये मेरे जैसे तुअच लोगो के कहने के लिए नहीं है।