शनिवार, 22 मई 2010

कबीर भोजपुरी के आदिकवि


(आगरा में शनिवार से विश्व भोजपुरी सम्मेलन होने जा रहा है। दुनिया भर के तमाम देशों से और देश के कोने-कोने से भोजपुरी के विद्वान साधक ताज के शहर में आ डटे हैं। इस मौके पर हिंदी और भोजपुरी के बारे में मशहूर साहित्यकार और हिंदी के अप्रतिम विद्वान हजारी प्रसाद द्विवेदी के विचार जानकर आप को अच्छा महसूस होगा। 1976 में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में उन्होंने भोजपुरी में जो भाषण दिया था, उसके अंश यहां हिंदी में दिये जा रहे हैं)



कबीरदास भोजपुरी के आदि कवि थे। उन्होंने कहा है, जो रहे करवा त निकंसे टोंटी। लोटे में पानी होगा, तभी तो टोंटी से निकलेगा। यहां तो एक बूंद भी पानी नहीं है। हम सोचते थे कि भोजपुरी अपनी मातृभाषा है, इसमें लिखना आसान होगा लेकिन जिस भाषा में हम रोज बोलते हैं, लगता है उसमें लिखना कठिन काम है। किसी भी भाषा में लेखन के लिए कुछ साधना की जरूरत होती है, कुछ मेहनत-मशक्कत करनी पड़ती है। मेरे अंदर तो ऐसा कुछ भी नहीं है।

भोजपुरी बहुत शक्तिशाली बोली है। लोकसाहित्य का ऐसा भंडार कहीं और नहीं दिखता। मुहावरे, लोकोक्तियां और व्यंग्य-विनोद का तो यह खजाना है। इसे बोलने वालों की संख्या भी विशाल है। पांच करोड़ से भी ज्यादा। बहुत कम भाषाएं हैं, जो इतने लोगों द्वारा बोली जाती हैं। भोजपुरियों में अपनी भाषा का गर्व भी बहुत है। ग्रियर्सन ने लिखा है कि ऐसा भाषा प्रेम उन्होंने कहीं और नहीं देखा। भोजपुरीभाषी हमेशा देश की अखंडता की बात सोचता है। इसके लिए वह सर्वस्व नयोछावर करने को भी तत्पर रहता है। वह अपने घर में भोजपुरी बोलता है, अपनी भाषा में कविता भी लिखता है लेकिन अलग रहने की बात कभी नहीं करता। हमारी सार्वदेसिक भाषा हिंदी को सजाने-संवारने में भी भोजपुरियों का भारी योगदान रहा है। सदल मिश्र और भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर अनेक बड़े-बड़े रचनाकार भोजपुरी क्षेत्र से संबंधित रहे हैं। अपनी बोली से प्रेम के बावजूद इन लोगों ने हिंदी को संवारने में अपना जीवन लगा दिया।

पुराने जमाने से देश में दो तरह की भाषाओं का प्रयोग होता आया है। एक लोकभाषा और दूसरी संस्कृत भाषा। कई बार लोकभाषा में अच्छा साहित्य रचा गया। अब बहुत कम बचा है, काफी कुछ नष्ट हो गया है। बौद्ध और जैन धर्म का प्रचुर साहित्य लोकभाषा में ही लिखा गया। पालि में अकूत साहित्य भरा पड़ा है। मुझे लगता है कि वह भोजपुरी का ही प्राचीन रूप है। जब तक बात धार्मिक उपदेश की, प्रेम की रही, आसानी से काम चलता रहा पर जब दर्शन, तर्कशास्त्र जैसे गंभीर विषयों की बात आयी तो फटाफट संस्कृत में लिखा जाने लगा। आधुनिक हिंदी भी पहले लोकभाषा के रूप में ही सामने आयी। लेकिन जैसे-जैसे उसमें लोकभाषा के तत्व कम होते जा रहे हैं, वह भी संस्कृत के पद पर बैठती जा रही है। अभी भी उसमें संस्कृत जैसा कसाव नहीं आया है मगर आ जायेगा। जहां तक सूक्ष्म चिंतन-मनन मूलक साहित्य की बात है, हिंदी निश्चित रूप से सार्वदेसिक भाषा का रूप ले चुकी है परंतु जहां तक रागात्मक अभिव्यंजना का प्रश्न है, हिंदी जन-जीवन से दूर होती जा रही है। एक तरह से बौद्धिक कसरत बढ़ती जा रही है। इसकी प्रतिक्रिया में हर बोली के प्रतिभावान साहित्यकार जनभाषा की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। आंचलिकता के नाम पर खिचड़ी भी पकायी जा रही है। यह अकारण नहीं हो रहा है, इतिहास विधाता के निर्देश पर हो रहा है।

विशाल हिंदीभाषाभाषी क्षेत्र में अनेक बोलियां बोली जाती हैं। ब्रजभाषा का साहित्य बहुत समृद्ध रहा है। अवधी, राजस्थानी की अपनी परंपरा रही है। भोजपुरी की साहित्यिक परंपरा भी कम पुरानी नहीं है। हिंदी सबको अपना मानकर चलती है। चाहे राष्ट्रभाषा कहें या राजभाषा या संपर्क भाषा, संविधान बनाने वालों ने हिंदी को सार्वदेसिक भाषा के रूप में चुना लेकिन बहुत से लोग इसे मानने को तैयार नहीं। वे चाहते हैं कि यह काम अंग्रेजी करती रहे। पहले थोड़ी शर्म थी पर अब तो लोग खुलकर कहने लगे हैं कि हिंदी नहीं अंग्रेजी ही संपर्क भाषा रहनी चाहिए। लेकिन कठिनाई यह है कि अंग्रेजी के साथ देश का आत्म सम्मान जुड़ नहीं पाता। इसलिए चलेगी तो हिंदी ही।

कोशिश यह भी हो रही है कि हिंदी की शक्ति कम की जाय। हिंदी के अंतर्गत आने वाली बोलियों में अलगाव के बीच बोने के प्रयास भी हो रहे हैं पर वे सफल नहीं होंगे। अलग-अलग बोलियों में भी बेहतर साहित्य लिखा जाता रहेगा और हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सम्मान भी मिलेगा। अगर भोजपुरी बोलने वालों को कुछ अधिक सुख-सुविधा, मान-सम्मान मिले तो इससे हिंदी को कोई आपत्ति नहीं होगी। भोजपुरी को भी हिंदी से प्रतिस्पर्धा की बात मन में नहीं लानी चाहिए। हमें हिंदी और भोजपुरी को एक ही समझकर काम करना चाहिए। दोनों को दो मानने पर झंझट होगी। हिंदी में लिखने वाले को भी नमन और भोजपुरी में लिखने वाले को भी। भगवान सबका कल्याण करे।

Posted by डा.सुभाष राय
Post Taken By Bhadas Blog

सोमवार, 10 मई 2010

बीबीसी हिंदी की जन्म कथा


नौ मई 1940. डेली टेलीग्राफ़ में एक छोटी सी ख़बर छपी जिसका शीर्षक था-

‘बीबीसी की नीति में बदलाव-बीबीसी अब हिंदुस्तानी में प्रसारण करेगी.’

ख़बर में बताया गया कि इस नई दैनिक सेवा का प्रसारण शॉर्टवेव पर जल्द ही शुरू होगा. ख़बर यह भी थी कि लॉयनल फ़ील्डिंग, जो 1935 में बीबीसी छोड़कर इंडियन गवरमेंट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस के पहले कंट्रोलर बने थे, हाल में ऑल इंडिया रेडियो से त्यागपत्र देकर वापस ब्रॉडकास्टिंग हाऊस पहुँच गए हैं.
लेकिन लॉयनल फ़ील्डिंग ने लंदन जाने से कई महीने पहले, 25 दिसंबर 1939 के दिन एक महत्वपूर्ण पत्र लिखा था. यह पत्र ऑल इंडिया रेडियो के बंबई स्टेशन में ज़ेड. ए. बुख़ारी के हाथ पहुँचा. ‘माई डियर बुख़ारी’- संबोधन में एक तरह की अनौपचारिकता थी. इसकी एक वजह यह थी कि अपने छात्र जीवन के तुरंत बाद बुख़ारी ब्रिटिश अधिकारियों को भारतीय भाषाएँ सिखाने वाले विभाग में उर्दू के ‘मुंशी’ हो गए थे और उस ज़माने में उनके छात्रों में से एक लॉयनल फ़ील्डन भी थे.
फ़ील्डन ने लिखा- ‘अब जब आपने सूचना मंत्रालय का ऑफर स्वीकार कर लिया है, मैं आपको पिछले दो सालों में बंबई स्टेशन का काम इतने सुचारू रूप से संभालने के लिए बधाई देना चाहूँगा. बंबई ही क्यों, 1935 से अब तक आपने इस सेवा के लिए जो कुछ किया है वह प्रशंसा के योग्य है. आपको अपने नए काम में भी सफलता मिले, इसके लिए मेरी शुभकामनाएँ.’

बुख़ारी साहब को इस समय शुभकामनाओं की ज़रूरत भी थी हालाँकि चुनौतियों का मुक़ाबला करने में उन्हें मज़ा भी आता था. दो साल पहले जब उन्हें बंबई स्टेशन भेजा गया था तो शायद किसी को उम्मीद नहीं थी कि वे मतभेदों और निष्क्रियता की वजह से गिरती साख़ वाले इस केंद्र को सुधार पाएँगे. मगर उन्होंने यह भी कर दिखाया.
एक बड़ी चुनौती

इससे पहले वे ऑल इंडिया रेडियो के दिल्ली केंद्र पर प्रोग्राम निदशक की हैसियत से अपनी योग्यता का परिचय दे चुके थे. और अब उनके सामने चुनौती थी. 19 जनवरी 1940 को बीबीसी की बोर्ड मीटिंग के बाद आधे घंटे का हिंदुस्तानी प्रसारण शुरू करने का फ़ैसला हुआ जिसकी ज़िम्मेदारी ज़ेड.ए. बुख़ारी को सौंपी गई.
बुख़ारी दिल ही दिल में जानते थे कि ‘ये आग का दरिया है और डूब के जाना है’. बीबीसी के पहले ‘प्रमुख हिंदुस्तानी सलाहकार’ के रूप में उन्हें कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ेगी. लेकिन उनके पास दो मज़बूत हथियार थे- निडर मगर कूटनीतिक तरीक़े से अपने विचार व्यक्त करने की हिम्मत और अँग्रेज़ी ज़बान की लच्छेदारी.

‘एक भारतीय होने के नाते अगर मैं यह कहूँ कि मेरे विचार में भारत का भी कुछ महत्व है तो उम्मीद है आप मुझे मुआफ़ करेंगे. पर मैं समझता हूँ कि प्रचार के हर इदारे में अब तक इस महत्ता की उपेक्षा की गई लगती है. भारत न सिर्फ़ ब्रिटिश साम्राज्य में सबसे बड़ी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि साम्राज्य में सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह भी बना हुआ है.

न सिर्फ़ बर्लिन, बल्कि रोम और टोक्यो भी भारत के लिए हिंदी और अँग्रेज़ी में दैनिक प्रसारण का महत्व समझते हैं. बीबीसी आज तक मोटे तौर पर अपने अधिकारियों की भेजी रिपोर्टों से दिशा निर्देश पाती रही है.’ ये शब्द बुख़ारी साहब ने 12 अक्तूबर 1940 के अपने एक ख़त में लिखे जिसका उद्देश्य लंदन स्थित ब्रॉडकास्टिंग हाऊस में बैठे अफ़सरों को यह समझाना था कि भारतीय श्रोता के मन और ज़रूरतों को समझने के लिए परंपरागत ख़ुफ़िया एजंसियों से अलग, एक स्वतंत्र श्रोता अनुसंधान विभाग स्थापित करने की ज़रूरत क्यों है.
इस काम के लिए उन्होंने तीन हज़ार पाऊँड के ख़र्चे का प्रस्ताव रखा था. ‘मैं इस तकलीफ़देह तथ्य से भी अवगत हूं कि इंगलैंड के पास भारत के नाम पर देने के लिए और सब कुछ है सिवाय पैसे के.’ यह कटाक्ष उन्होंने अपने एक और मेमो में किया.

इसमें कोई शक नहीं कि बीबीसी हिंदुस्तानी सर्विस का जन्म इस उद्देश्य से हुआ था कि विश्वयुद्ध में ब्रिटेन के पक्ष का प्रचार किया जाए. उस युद्ध में ब्रितानी फ़ौजों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाले असंख्य भारतीय सैनिक थे. उनकी हौसला अफ़ज़ाई भी ज़रूरी थी.
आज़ादी का इंतज़ार

फिर यह वह समय था जब भारत में लोगों ने आज़ादी की घड़ी के दिन गिनना शुरू कर दिया था. जर्मनी, जापान और ब्रिटेन में से कौन बड़ा दुश्मन है- इस प्रश्न पर मत विभाजित था. 22 अप्रैल 1940 को लायनल फ़ील्डिंग ने अपने मेमो में कहा-

‘मैं चाहता हूँ कि बीबीसी का हिंदुस्तानी प्रोग्राम ग्रीनिच मान समय के हिसाब से दो बजे शुरू (भारत में शाम साढ़े सात बजे) हो पर हर हालत में ढाई बजे तक ख़त्म हो जाए क्योंकि जर्मनी के हिंदुस्तानी प्रसारण ढाई बजे शुरू होता है. अगर हमारे प्रसारण और जर्मन प्रसारण के बीच ख़ाली वक्त बचेगा तो जर्मनी को हमारे प्रसारण पर फ़ालतू की टीका टिप्पणी करने का मौक़ा मिल जाएगा.’

बुख़ारी साहब किसी मुग़ालते में नहीं थे. उन्हें अच्छी तरह पता था कि इस सेवा का उद्देश्य जर्मन प्रॉपेगैंडा का मुँहतोड़ जवाब देना है. लेकिन प्रचार के भी कुछ उसूल होते हैं. प्रॉपेगैंडा के बारे में उन्होंने लिखा-

‘प्रॉपेगैंडा मूल रूप से एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जो डर, लालच, नफ़रत, महत्वाकाँक्षा जैसी भावनाओं के साथ खेलती है. अगर हम जनमत को बदलना चाहते हैं तो हमें सावधानी बरतते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारा संदेश उन लोगों के उपयुक्त हो जिन तक हम उसे पहुँचाना चाहते हैं. इस वक़्त एक आम भारतीय को लगता है कि इस लड़ाई से उसका कोई मतलब नहीं है, उसे यह भी लगता है कि ब्रिटन इस समय कमज़ोर है और भारतीयों में यह भावना प्रबल है कि भारत को स्वाधीन होना चाहिए.
बुख़ारी साहब का तर्क था कि जर्मन प्रॉपेगैंडा ब्रिटन विरोधी भावनाओं को तो भड़काता है लेकिन अभी तक उसका ध्यान इस तरफ़ नहीं गया कि हिटलर की दुनिया में आज़ाद भारत की तस्वीर क्या होगी.

उन्होंने प्रस्ताव रखा कि ख़बरों और जर्मनी की क्रूरता के उदाहरणों के अलावा हिंदुस्तानी कार्यक्रमों में ब्रितानी संस्कृति, कविता और दर्शन की चर्चा के साथ-साथ भारतीयों की उपलब्धियों पर फ़ोकस हो जैसे ब्रिटन में पढ़ने वाले छात्र, 1914-1918 की लड़ाई में ब्रितानी फ़ौज की तरफ़ से लड़ने वाले भारतीय सिपाहियों की तारीफ़, लड़ाई के बाद विकसित होने वाले भारतीय उद्योगों की चर्चा, जाने माने भारतीयों की तारीफ़ वग़ैरह.
प्रचार हो पर नफ़ासत से

सूची काफ़ी लंबी थी जिसे पढ़कर साफ़ साफ़ समझ आता है कि बुख़ारी भारतीय मानस और ब्रिटिश हुकूमत के इरादों, दोनों को अच्छी तरह समझते थे. इसलिए वे चाहते थे कि प्रचार हो तो ज़रा नफ़ासत से हो. भौंडा ना हो.

एक नोट में उन्होंने कहा- ‘और हमें ब्रिटिश साम्राज्य में आज़ादी और वैयक्तिक स्वतंत्रता जैसे विचारों का ज़िक्र करने से बचना चाहिए क्योंकि, यह बात सही है या ग़लत, भारतीय जनता को लगता है कि राजनीतिक आज़ादी या वैयक्तिक स्वतंत्रता उसके हिस्से में नहीं आई है.’

30 मार्च 1940 को बुख़ारी साहब ने हिंदुस्तानी सर्विस की भाषा पर अपने विचार लिख भेजे. हिंदुस्तानी, उनके विचार में उर्दू मिश्रित वो भाषा थी जो भारत का आम आदमी बोलता है. इसलिए यह प्रस्ताव रखा कि जहाँ तक बीबीसी के प्रसारक का सवाल है वह आम आदमी की भाषा में ही बोलेगा. हाँ, मामला वहाँ मुश्किल हो जाएगा जब बाहर के लोगों को वार्ता देने के लिए बुलाया जाएगा.

भारत के तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य की तरफ़ इशारा करते हुए उन्होंने लिखा- ‘भारत की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता (जिसका स्वाभाविक निष्कर्ष है कि भारत में बहुसंख्य का शासन होगा) की संभावनाओं के चलते, बहुसंख्यक हिंदुओं ने अपनी भाषा से अरबी फारसी के शब्दों का तिरस्कार शुरू कर दिया है जो मुसलमानों ने भारत को दिए थे.
दूसरी तरफ़ मुसलमानों ने भी अपनी भाषा में अरबी और फ़ारसी के मुश्किल शब्दों को लाना शुरू कर दिया है. पहले की उर्दू में हम कहते थे- मौसम ख़राब है. लेकिन काँग्रेस और मुस्लिम लीग की आधुनिक भाषा में कहा जाएगा- मौसम की परिस्थितियाँ विपरीत हैं.’

वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए और आलोचना से बचने के लिए बुख़ारी ने सुझाव दिया कि हिंदुस्तानी प्रसारण में दोनों ख़ेमों के लोगों को बराबरी से आमंत्रित किया जाए. लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाए कि संस्कृतनिष्ठ भाषा में लिखी गई वार्ता को हिंदी कहा जाए न कि हिंदुस्तानी. इसी तरह जिसमें अरबी फ़ारसी के भारी शब्द हों, उसे उर्दू की वार्ता कहना बेहतर होगा न कि हिंदुस्तानी की.
शैली की बात

बुख़ारी ने चुटकी लेते हुए लिखा-‘हम बर्नार्ड शॉ से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे अपनी शैली बदल दें. उम्मीद है कि कुछ ऐसे लोग भी हमारे लिए लिखेंगे जिनकी भाषा हिंदुस्तानी होगी, पर ज़ाहिर है वे बर्नार्ड शॉ नहीं होंगे. वे बुख़ारी जैसे लोग होंगे.’

11 मई 1940 को बीबीसी की हिंदुस्तानी सेवा ने दस मिनट के समाचार बुलिटिन के साथ अपना पहला प्रसारण किया. जून 1941 में जाकर हिंदुस्तानी सेवा को आधा घंटा मिला. पर बुख़ारी इतने से संतुष्ट नहीं थे. 22 मई 1941 को उन्होंने बीबीसी के एम्पायर सर्विस निदेशक आर. ए. रैन्डॉल के नाम एक लंबा ख़त लिखा-

‘अगर बीबीसी स्वीकार करती है कि इस युद्ध में भारतीय जनमत की महत्ता है तो उसे मौजूदा हिंदुस्तानी प्रसारण के अलावा भारतीय समय के अनुसार सुबह आठ बजे भी हिंदुस्तानी समाचार शुरू करना चाहिए.’

सुबह आठ बजे का समय तो तब नहीं मिल पाया लेकिन 1943 तक आते-आते हिंदुस्तानी सेवा की एक से ज़्यादा सभाएं हो गई. बुखारी 1945 तक बीबीसी की हिंदुस्तानी सर्विस के संचालक बने रहे और जब तक रहे, प्रसारण का समय बढ़ाने की उनकी कोशिशें जारी रहीं. 1947 में विभाजन के बाद, यही ज़ुल्फ़िकार अली बुख़ारी पाकिस्तान रेडियो के पहले महानिदेशक चुने गए.

शुक्रवार, 7 मई 2010

'निरुपमा के पुरुष मित्र पर केस दर्ज हो'

झारखंड में कोदरमा की एक अदालत ने पुलिस को पत्रकार निरुपमा पाठक की संदेहास्पद स्थिति में हुई मौत के मामले में उनके पुरुष मित्र प्रियाभान्शु रंजन के खिलाफ बलात्कार और यौन शोषण के मुकदमे दर्ज करने के निर्देश दिए हैं.

कोडरमा के मुख्य दंडाधिकारी एमके अग्रवाल ने ये निर्देश निरुपमा की मां की अर्ज़ी पर दिए हैं. निरुपमा की मां सुधा पाठक फ़िलहाल न्यायिक हिरासत में है.

अदालत ने सुधा पाठक को नौ मई से 11 मई तक पैरोल पर रिहा करने का भी आदेश दिया ताकि वो अपनी बेटी के श्राद्ध-कर्म में भाग ले सकें.

अदालत ने प्रियभांशु के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 376 (बलात्कार) और 306 (मौत के लिए मजबूर करना) सहित अन्य धाराओं के अंतर्गत मुक़दमा दर्ज करने के लिए निर्देश दिए हैं.

निरुपमा की मां सुधा ने आरोप लगाया है कि प्रियभांशु ने उनकी बेटी को शादी के नाम पर फुसलाकर यौन शोषण किया.

तेईस वर्षीया पत्रकार निरुपमा पाठक दिल्ली के एक समाचार पत्र में काम करतीं थीं. उन्हें 29 अप्रैल को झारखंड में उनके कोडरमा स्थित निवास में मृत पाया गया था. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार निरुपमा की मौत दम घोंटे जाने से हुई है.
'मजबूर किया गया'

अपनी अर्ज़ी में सुधा ने दावा किया है कि निरुपमा अपनी मौत के समय तीन महीने की गर्भवती थीं और जब प्रियभांशु ने शादी करने से मना कर दिया तो उनकी बेटी ने सामाजिक डर के कारण अपनी जान दे दी.

प्रियभांशु फ़िलहाल दिल्ली में रह रहे हैं और झारखंड पुलिस ने उनसे पूछताछ की है.

इस मामले में पुलिस ने मौत की परिस्थितियों को जानने के लिए निरुपमा के पिता और भाई से भी पूछताछ की है. पुलिस को इस बात का भी संदेह है कि निरुपमा को 'इज़्ज़त के नाम' पर क़त्ल किया गया.

निरुपमा के परिवार वालों का कहना है कि उसने आत्महत्या की है, लेकिन पोस्टमार्टेम रिपोर्ट के अनुसार निरुपमा का गला घोंटा गया.

हालांकि परिवार वालों ने इस बात को स्वीकार किया है कि वे निरुपमा की प्रियाभांशु से शादी के ख़िलाफ़ थे.

मंगलवार, 4 मई 2010

सेक्स लाइफ गांधीजी की


क्या राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी असामान्य सेक्स बीहैवियर वाले अर्द्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे? जी हां, महात्मा गांधी के सेक्स-जीवन को केंद्र बनाकर लिखी गई किताब “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” में एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हवाले से ऐसा ही कहा गया है। महात्मा गांधी पर लिखी किताब आते ही विवाद के केंद्र में आ गई है जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसकी मांग बढ़ गई है। मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जैड ऐडम्स ने पंद्रह साल के अध्ययन और शोध के बाद “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” को किताब का रूप दिया है। रिश्ते को सनसनीख़ेज़ बनाने की कोशिश की गई है। मसलन, जैड ऐडम्स ने लिखा है कि गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बाथरूम में “नग्न स्नान” भी करते थे।
महात्मा गांधी हत्या के साठ साल गुज़र जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं। अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा-स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता-फिरता है। ऐडम्स ने किताब में लिखा है कि गांधी ने अपने आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन बनाया था कि उनकी छवि 20वीं सदी के धर्मवादी नेताओं जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश की तरह बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स अपील से अनुयायियों को क़रीब-क़रीब ज्यों का त्यों वश में कर लेते थे। ब्रिटिश हिस्टोरियन के मुताबिक महात्मा गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे। किताब के मुताबिक हालांकि अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और सेक्स से जुड़े तत्थों के बारे में आमतौर पर खुल कर लिखते थे. किताब की शुरुआत ही गांधी की उस स्वीकारोक्ति से हुई है जिसमें गांधी ख़ुद लिखा या कहा करते थे कि उनके अंदर सेक्स-ऑब्सेशन का बीजारोपण किशोरावस्था में हुआ और वह बहुत कामुक हो गए थे। 13 साल की उम्र में 12 साल की कस्तूरबा से विवाह होने के बाद गांधी अकसर बेडरूम में होते थे। यहां तक कि उनके पिता कर्मचंद उर्फ कबा गांधी जब मृत्यु-शैया पर पड़े मौत से जूझ रहे थे उस समय किशोर मोहनदास पत्नी कस्तूरबा के साथ अपने बेडरूम में सेक्स का आनंद ले रहे थे।

सीनियर लीडर जेबी कृपलानी और वल्लभभाई पटेल ने गांधी के कामुक व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली। यहां तक कि उनके परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी इससे ख़फ़ा थे। कई लोगों ने गांधी के प्रयोगों के चलते आश्रम छोड़ दिया। ऐडम ने गांधी और उनके क़रीबी लोगों के कथनों का हवाला देकर बापू को अत्यधिक कामुक साबित करने का पूरा प्रयास किया है। किताब में पंचगनी में ब्रह्मचर्य का प्रयोग का भी वर्णन किया है, जहां गांधी की सहयोगी सुशीला नायर गांधी के साथ निर्वस्त्र होकर सोती थीं और उनके साथ निर्वस्त्र होकर नहाती भी थीं। किताब में गांधी के ही वक्तव्य को उद्धरित किया गया है। मसलन इस बारे में गांधी ने ख़ुद लिखा है, “नहाते समय जब सुशीला निर्वस्त्र मेरे सामने होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता। मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है। मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ अंतःवस्त्र पहनी होती है।”किताब के ही मुताबिक जब बंगाल में दंगे हो रहे थे गांधी ने 18 साल की मनु को बुलाया और कहा “अगर तुम साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते। आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें।”

ऐडम्स के मुताबिक हत्या के बाद गांधी को महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया, जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी दरअसल सेक्स मैनियैक थे। कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी और उनके सेक्स-एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच को छुपाती रही है। गांधीजी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सलाह दी गई। सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप ही रहीं.
ऐडम्स के अनुसार सुशीला नायर, मनु और आभा के अलावा बड़ी तादाद में महिलाएं गांधी के क़रीब आईं। कुछ उनकी बेहद ख़ास बन गईं। बंगाली परिवार की विद्वान और ख़ूबसूरत महिला सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध जगज़ाहिर है। हालांकि गांधी केवल यही कहते रहे कि सरलादेवी उनकी “आध्यात्मिक पत्नी” हैं। गांधी जी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को प्रेमपत्र लिखते थे। इस्टर जब आश्रम में आती तो बाकी लोगों को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे। किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया।
जैड दावा करते हैं कि उन्होंने ख़ुद गांधी और उन्हें बेहद क़रीब से जानने वालों की महात्मा के बारे में लिखे गए किताबों और अन्य दस्तावेजों का गहन अध्ययन और शोध किया है। उनके विचारों का जानने के लिए कई साल तक शोध किया। उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे

"उसके गर्भाशय में 10-12 हफ्ते का शिशु भ्रूण था"


निरुपमा की तस्वीर को कम से कम दो-तीन बार ध्यान से ज़रूर देखिएगा....आपको नीरू की इस तस्वीर में कहीं न कहीं अपनी बेटी...बहन...ज़रूर नज़र आएगी....और अगर नहीं आती है तो फिर अपने आप को आइने में दो-चार बार ज़रूर देखिएगा .कि क्या आपमें इंसान होने के कितने लक्षण बचे हैं.
नीरू की गलती थी कि वो सही रास्ते से अपनी मंज़िल पाना चाहती थी...अगर नीरू बिना घरवालों की मर्ज़ी के ये शादी कर लेती तो ज़्यादा से ज़्यादा एक दो साल बाद यही लोग उसे वापस अपना लेते...पर हमारे तथाकथित सभ्य समाज को सीधे और सरल तरीके पसंद ही कहां हैं....हमारी गौरवशाली संस्कृति का दम भरने वाले ठेकेदार अब कहां हैं...और क्या नाम देंगे इसे...
जानता हूं कि अभी भी कई लोग सवाल करेंगे कि क्या गारंटी है कि नीरू ने आत्महत्या नहीं की उसका क़त्ल हुआ है....तो एक बार उसकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट (पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का लिंक...ज़रूर देखें) पूरा ज़रूर पढ़ें....चलिए आपको बता ही देते हैं सरल भाषा में ये क्या कहती है....

* उसकी श्वसन नली में कंजेशन था....
* उसके दोनो फेफड़ों में भी कंजेशन था...
* ह्रदय के दोनो कोष्ठों में रक्त था...
* उसके लिवर में कंजेशन था....
* उसकी किडनी में कंजेशन था...
* स्प्लीन में कंजेशन था...

मतलब कुल जमा ये कि उसकी मौत दम घुटने से हुई...और ये सामान्य बुद्धि है कि कोई भी अपना गला खुद घोंट कर आत्महत्या नहीं कर सकता है....
लेकिन सबसे दर्दनाक सच सामने लाती है पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की आखिरी लाइन.....

"उसके गर्भाशय में 10-12 हफ्ते का शिशु भ्रूण था"
बहुत से लोग अब इस पर भी उंगलियां उठाएंगे...नाक भौं सिकोड़ेंगे...क्योंकि समाज की सभ्यता का यही तकाज़ा है....किसी को नहीं बख्शेंगे ये लोग....पर मैं केवल ये जानता हूं कि अगर ये हत्या है तो ये दोहरा हत्याकांड है....
क्या कहूं....जिस धर्म...जाति और ईश्वर की ये समाज दुहाई देता है क्या वाकई उसका कोई अस्तित्व भी है....

क्या ये वही लोग हैं जो साल में दो बार 8 दिनों तक नारी शक्ति की पूजा पाठ कर्मकांड कर के नवें दिन कन्याओं के पैर छूते हैं.
माफ करना नीरू हम तुम्हें बचा नहीं पाए...पर क्या अफसोस करें तुम्हारे जैसी हज़ारों नीरू हम खो चुके हैं...शायद खोते भी रहेंगे....
मेरा पुनर्जन्म में कतई यकीन नहीं है...पर मैं जानता हूं एक और नीरू कहीं और जन्म ले चुकी है...उसकी होनी में क्या लिखा है....हक...या मौत

खबरदार करते न्यूज चैनलों में खबर कहां है?


एक झटके में लगा कि महिला आरक्षण को लेकर खबरों की जो संवेदनशीलता हिन्दी न्यूज चैनलों में दिखायी जा रही थी, उसने अपनी टीआरपी के खेल में खबरों की जगह टीआरपी वाले इंटरटेनमेंट चैनलों के सीरियलो की टीआरपी को भी खुद से जोड़ने की नायाब पहल शुरु कर दी है। कुछ इसी तर्ज पर खबरों को कवर करने से लेकर दिखाने का खेल भी न्यूज चैनल खुल्लम खुल्ला अपनाने लगे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स की कवरेज को लेकर दिल्ली में ओलंपिक एसोसिएशन ने न्यूज चैनलों को आमंत्रित किया। कमोवेश हर न्यूज चैनल के संपादक स्तर के पत्रकार कैमरा टीम के साथ इस बैठक में नजर आये। सभी के पास कॉमनवेल्थ गेम्स के कवरेज को लेकर प्लानिंग थी। और सभी सीधे सुरेश कलमाडी से संवाद बनाने में लगे थे।
वहीं माओवादियों के खिलाफ ग्रीन हंट शुरु होने के बाद पहली बार दिल्ली में सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी करते हुये कई लोग एकसाथ मंच पर आये। इसमें जानी मानी लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति राय, पूर्व आईएएस और नक्सलियों के बीच काम कर रहे बी डी शर्मा से लेकर मेनस्ट्रीम पत्रिका के संपादक सुमित चक्रवर्ती समेत कई क्षेत्रों से जुड़े आधे दर्जन से ज्यादा लोगों ने दिल्ली के फॉरेन प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीबीसी,रायटर्स और सीएनएन जैसे अंतरराष्ट्रीय चैनल और एजेंसियों के पत्रकार मौजूद थे।
सुरेश कलमाडी आज की तारीख में किसी भी न्यूज चैनल के संपादक के लिये सबसे बड़े व्यक्ति हैं। क्योंकि कॉमनवेल्थ के प्रचार प्रसार में मीडिया के हिस्से में करीब पाच सौ करोड़ का विज्ञापन है। और इस पूंजी को पाने के लिये कोई भी न्यूज चैनल अब यह खबर नहीं दिखा सकता है कि कॉमनवेल्थ की तैयारी कमजोर है। य़ा फिर दिल्ली में यमुना की जमीन से लेकर कॉमनवेल्थ के लिये दिल्ली में हजारों हजार पेड़ काटे जा चुके हैं और सिलसिला लगातार जारी भी है। यमुना की जमीन पर जिस तरह कॉमनवेल्थ के लिये कंक्रीट का जंगल खडा किया गया है, उससे सौ साल में सबसे ज्यादा पर्यावरण गर्म होने की स्थिति दिल्ली की है।इस पर भी कोई खबर दिखाना नहीं चाहता क्योंकि उसे डर है कि कहीं कॉमनवेल्थ के प्रचार-प्रसार का विज्ञापन उसकी झोली से ना खिसक जाये। साथ ही वह तमाम कॉरपोरेट कंपनियां, जिनका जुडाव कॉमनवेल्थ गेम्स से है उनको लेकर भी कमाल का प्रेम मीडिया ने दिखाना शुरु कर दिया है। क्योंकि निजी विज्ञापन भी करीब हजार करोड से ज्यादा का है, जिसका इंतजार मीडिया कर रहा है। मीडिया की पूरी नजर इस वक्त करोड़ों रुपए के इन विज्ञापनों पर ऐसी टिकी है कि उसे इसके अलावा कुछ दिखायी नहीं दे रहा।
जाहिर है खबरो को दिखाने के लिये सरकार से लाइसेंस ले कर खड़े हुये न्यूज चैनलो की समूची कतार ही जब खबरों को परिभाषित करने से पहले अपना मुनाफा और मुनाफे पर टिके धंधे को ही देख रही हो तब न्यूज को परिभाषित करने का तरीका भी बदलेगा और देश के हालात पर भी वही नजरिया सर्वमान्य करने की कोशिश होगी जो सरकार की नीति में फिट बैठे। ऐसे में अगर किसी न्यूज चैनल में किसी दुर्घटना या आतंकवादी हमला या फिर ब्लास्ट से इतर कोई भी खबर दिखायी दे जाये तो एक बार उसकी तह में जाकर जरुर देखना चाहिये क्योंकि बिना मुनाफे के कोई खबर खबर बन ही नहीं सकती।

सोमवार, 3 मई 2010

डिजाइनर कपड़ों के लिए जिस्म

हॉन्गकॉन्ग में डिजाइनर और ब्रैंडेड कपड़े खरीदने के लिए छात्राएं जिस्म बेच रही हैं। हाल में जारी एक सर्वे में यह चौंकानेवाली बात सामने आई है।
र्वे के मुताबिक, हॉन्गकॉन्ग की स्कूली छात्राएं डिजाइनर कपड़ों की खरीदारी के लिए अपना जिस्म बेच रही हैं। हॉन्गकॉन्ग में बढ़े रहे इस ट्रेन्ड को 'कॉम्पेन्सेटेड डेटिंग' का नाम दिया जा रहा है। इस सर्वे में शामिल 87 फीसदी लोगों ने कहा कि टीनएजर्स छात्राएं जिस्म बेचकर पैसे कमा रही हैं ताकि वे डिजाइनर और ब्रैंडेड कपड़े खरीद सकें। सर्वे में शामिल 6.6 फीसदी स्टूडंट्स ने भी स्वीकार किया कि वह ऐसी लड़कियों को जानते हैं, जिन्होंने डिजाइनर कपड़े खरीदने के लिए जिस्म बेचा है। सर्वे में कुल 3 हजार लोग शामिल हुए थे। पुलिस ने भी पिछले दिनों कई ऐसे लोगों को को गिरफ्तार किया है, जो इन छात्राओं के लिए दलाल का काम कर रहे थे।
गौरतलब है कि पिछले दिनों पुलिस ने एक 19 साल की लड़की को भी गिरफ्तार किया था। सिर्फ 1250 रुपये देकर एक पुरुष ने इस लड़की के साथ बस में ओरल सेक्स किया था और विडियो बनाया था। बाद में यह विडियो इंटरनेट पर जारी कर दिया गया था। गौर करने लायक बात यह है कि लड़की ने यह सब इसलिए किया था क्योंकि उसे फेमस बैग ब्रैंड गुची का बैग खरीदने के लिए पैसे चाहिए थे।

ऐसा मानना है कि 'कॉम्पेन्सेटेड डेटिंग' का चलन जापान के रास्ते हॉन्गकॉन्ग में आया है। अमूमन इसमें कम उम्र की लड़कियां पैसे लेकर उम्रदराज पुरुषों के साथ सेक्स संबंध बनाती हैं।

शनिवार, 1 मई 2010

स्त्री पर ही क्यों किये गांधी ने प्रयोग?


महात्मा के नाम से संबोधित किये जाने वाले गांधीजी की स्त्री के प्रति आसक्ति को लेकर उनकी शहादत के कई दशकों के बाद अब एक बार फिर बहस चल रही है।यह गांधी के दर्शन का वह पक्ष है जिसे गांधी-भक्त उनके जीवन काल में और उनकी मृत्यु के बाद भी सलीके से परदे के पीछे रखते आ रहे हैं, वह पक्ष है गांधी जी का कुछ स्त्रियों के साथ विशेष आचरण या उनके 'ब्रह्मचर्य प्रयोग'। गांधी भक्तों का इस पक्ष में ऑंख मूँदना इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि इन प्रयोगों में कुछ ऐसा अवश्य था जो इनकी नैतिकता के मापदंड पर खरा नहीं उतरता है। सवाल यह भी उठता है कि उन्होंने स्त्री का उपयोग अपने प्रयोगों में इस हद तक जाकर क्यों किया? हालांकि गांधी जी ने इन प्रयोगों को गुप्त नहीं रखा। आश्रम जीवन में यह संभव भी नहीं था पर इन्हें अन्य प्रयोगों की तरह सार्वजनिक भी नहीं किया। निकट सहयोगियों की आलोचना के दबाव में जब भी उन्हें चर्चा करना पड़ी तो घुमा-फिरा कर की। गांधी जी ने एक पत्र में लिखा था कि 'मुझे मालूम है कि कैम्प के सभी लोग जानते हैं कि मनु मेरी खाट में साझेदारी करती है। वैसे भी मैं छुपाकर कुछ नहीं करना चाहता हँ। मैं इसको विज्ञापित नहीं कर रहा हूँ। यह मेरे लिए अत्यंत पवित्र चीज है।' संदेह और अविश्वास को दूर करने के लिए फरवरी 1947 में गांधीजी ने नोआखाली की एक प्रार्थना सभा में मनु के साथ बिस्तर की साझेदारी की बात सबके सामने रखी। लेकिन यह नहीं बतलाया कि इस साझेदारी में मनु वस्त्रहीन अवस्था में होती थी। गांधी जी ने स्वयं इस विषय को खुली बहस के बाहर रखा था। बहस यदि आज चलायी जाए तो निरर्थक होगी। गांधी जी का ब्रह्मचर्य का व्रत बहस के परे हो सकता है। पर जिन महिलाओं पर उन्होंने अपने प्रयोग किये उन पर क्या बीती होगी, यह बहस और विश्लेषण के परे नहीं हो सकता। गांधी जी के प्रयोगों की जाँच इसलिए आवश्यक हो जाती है, क्योंकि इन्हीं प्रयोगों में वे विचार-सूत्र छिपे हैं जिनसे गांधी जी ने स्त्री-मानस की बनावट तथा स्त्री महत्ता के संबंध में अपने आदर्श खड़े किये हैं। प्रयोगों की चर्चा का एक कारण और भी है स्त्री, ग़ांधी जी के अहिंसा-दर्शन का एक महत्वपूर्ण अंग है।

ब्रह्मचर्य प्रयोग और गांधी जी द्वारा अंकित स्त्री की छवि में कितना गहरा पारस्परिक संबंध है इसे समझने के लिए हमें उन विचारों पर दृष्टि डालनी होगी जो उन्होंने स्त्री-जाति को लेकर व्यक्त किये हैं। स्त्री को परिभाषित करते हुए गांधी जी ने लिखा है कि 'स्त्री अहिंसा की प्रतिमूर्ति है। अहिंसा का अर्थ है असीम प्रेम, जिसका दूसरा अर्थ है दुख भोगने की अपार क्षमता।' स्वभाव से अहिंसक होने के कारण पुरुष की तुलना में 'स्त्री अधिक सदाचारी है।' 'धर्म और आत्मत्याग' से उपजी व्यथा को स्त्री सहर्ष झेल लेती है। सेक्स के प्रति स्त्री की रुचि पति की आशा के सामने 'नतमस्तक' होने और 'आत्मत्याग' के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। स्त्री का 'प्रेम नि:स्वार्थ और मातृत्वपूर्ण है।' गांधी जी का निवेदन था कि वह 'इस प्रेम को सारी मानवता की ओर मोड़ दे, उसे भूल जाना चाहिए कि वह पुरुष की कामुकता का लक्ष्य है।' जो स्त्री ऐसा करने में समर्थ होगी वह पुरुष की दृष्टि में माँ का, मूक नेता का गौरवमय पद प्राप्त करेगी।' स्त्री 'निरीह' और 'यौन इच्छा रहित है।' उसके आनंद का 'स्त्रोत' और जीवन की एकमात्र धुरी उसके मातृत्व में है। एक माँ, एक बहन और एक पत्नी के रूप में ही उसका जीवन सार्थक होता है।

स्त्री की इस स्वनिर्मित छवि को गांधीजी ने अपने ब्रह्मचर्य की आधारशिला बना लिया। 1906 में जब उन्होंने 37 वर्ष की आयु में ब्रह्मचर्य का व्रत लिया तो कस्तूरबा का मन टोहने की कोई आवश्यकता उन्होंने अनुभव नहीं की। स्त्री यौन- इच्छा रहित जो ठहरी। जब स्त्री गांधी जी के लिए भोग की वस्तु नहीं रही तो वह उनके प्रयोग की वस्तु बन गयी। ब्रह्मचर्य का व्रत ही पर्याप्त नहीं था। इस पर खरा उतरने के लिए गांधी जी को अपने को बार-बार कसौटी पर चढ़ाना भी अनिवार्य लगा। स्त्री ही ब्रह्मचर्य की एकमात्र कसौटी है, इसलिए उन्होंने अपने आश्रम की अनेक स्त्री कार्यकर्ताओं को अपने 'ब्रह्मचर्य प्रयोगों' की कसौटी बना डाला। गांधी जी को पूरा भरोसा था कि उनके प्रयोगों की कसौटी बनी स्त्री को किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक क्षति नहीं पहँचेगी। उनके अडिग ब्रह्मचर्य के रहते उनके बिस्तर पर लेटा स्त्री का नग्न शरीर पूरी तरह से सुरक्षित था।तीन को छोड़कर बाकी जिन स्त्रियों पर ब्रह्मचर्य का प्रयोग किया गया उनको गांधी जी और उनके सहयोगियों ने गुमनाम रखा है।गांधी जी नोआखली के दौरे पर न निकले होते तो मनु, आभा और सुशीला नैयर के नाम भी सामने नहीं आते। 1८ वर्षीय मनु गांधी जिनका लालन-पालन गांधी जी की देखरेख में हुआ था और जो उनके भतीजे की बेटी थी, नोआखली के हिंसक वातावरण में गांधी जी के प्रयोग की कसौटी बनी। गांधी जी ने घोषित किया यदि मैं ब्रह्मचर्य पर पूरी विजय पा जाऊँ तो 'मैं जिन्ना को इसमें पाकिस्तान बनाने में परास्त कर दूँगा।'

यह हाड-मांस की स्त्री वैसे ही यौन-इच्छा रहित थी जैसी कि गांधी जी ने वर्णित की तब अपने हर 'प्रयोग' के बाद वे अपने बिस्तर पर लेटने वाली स्त्री से यह क्यों जानना चाहते थे कि उसके अन्दर कोई इन्द्रिय भावना तो नहीं जागी।' 'कोई कुविचार तो मन में नहीं आया? स्त्री के नकारात्मक उत्तर से वे तुरन्त संतुष्ट क्यों हो जाते थे? कैसे मान लिया जाय कि जब वस्त्रहीन स्त्री उनके शरीर के कंपन को रोकने के लिए रात में (गांधी जी का शरीर कई बार कंपन का शिकार हो जाता था) उन्हें अपनी बाहों में समेटती थी तो भीतर से सर्वथा निर्विकार बनी रहती थी? यदि सब भावनाविहीन कठपुतलियाँ थीं तो इनमें से कइयों का मानसिक संतुलन क्यों बिगड़ गया?

गांधी जी के निकटतम सहयोगी उनसे इस बात से सहमत नहीं थे कि इन प्रयोगों से स्त्रियों में कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी या उनको किसी प्रकार की हानि नहीं भरनी पड़ रही थी। निर्मल कुमार बोस जो नोआखली में गांधी जी के साथ थे, प्रयोगों का माध्यम बनायी गयी स्त्रियों की मानसिक दुर्दशा के प्रति उदासीन नहीं रह पाये। विक्षुब्ध होकर उन्होंने गांधी जी के साथ इस विषय पर कई बार मौखिक और पत्रों द्वारा बहस की। प्रयोगों से इन स्त्रियों का व्यक्तित्व कैसे छिन्न-भिन्न हो रहा था इससे गांधी जी को अवगत कराना उन्होंने अपना कर्तव्य समझा। गांधी जी ने उनसे असहमत होते हुए उत्तर दिया- 'अ, ब, स की हिस्टिरिया की बीमारी का मेरे प्रयोगों से कोई संबंध नहीं है। प्रयोग के बाद आज वे वैसी ही हैं जैसे पहले थीं।' सच्चाई कुछ और थी। इन तनावग्रस्त स्त्रियों की दबी यौन-इच्छा बापू की निकटता पाने की स्पर्धा में बदल गयी। बोस ने ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख किया है। एक बार सुशीला नैयर की उनके साथ चलने की जिद पर क्रोधित होकर गांधी जी अपना माथा ठोंककर रोने लगे थे। इन स्त्रियों के तनाव से जो वातावरण खड़ा हुआ उससे गांधी जी अछूते नहीं रह सके। बोस ने गांधी जी को लिखा 'उसके विरुध्द (स्त्री का नाम नहीं दिया है) मेरा यह आरोप है कि वह ब्यूरोक्रेटिक हो गयी है और ऐसी घड़ी में आपके समय का अधिकांश भाग ले रही है, जब राष्ट्रहित के लिए आपकी एकाग्र सेवाओं की आवश्यकता है। मैंने देखा कि- 'हर बार वह आपके पास होती थी, आपका मन अशांत हो जाता था। इससे आपकी कार्यक्षमता में निश्चित रूप से बाधा आती थी।'

गांधी जी के प्रयोगों में जो स्त्रियाँ सम्मिलित हुईं उन्होंने ऐसा स्वेच्छा से और समझ-बूझकर नहीं किया था। भावनात्मक रूप से उन पर निर्भर होने के कारण उन्होंने उनकी आज्ञा का पालन मात्र किया था। आभा गांधी का यह कथन ध्यान देने योग्य है- 'यह सभी को पता था कि सुशीला नैयर बापू के साथ सोती थी। मुझे पहली बार जब सोने को कहा गया तो मैं सोलह वर्ष की थी। मैंने सोचा रात में उनको सर्दी लगती है, उन्हें गरम रखने के लिए मुझे सोने के लिए कहा गया है, दो साल के बाद नोआखाली में मैं नियमित रूप से उनके साथ सोती थी।' गांधी जी की इन स्त्रियों के सामाजिक संबंध भी अप्रभावित नहीं रहे। काका कालेलकर के पुत्र ने सुशीला नैयर की गांधी भक्ति से पीड़ित होकर उनके साथ अपनी सगाई तोड़ दी। भावी पत्नी की गांधी भक्ति के कारण विवाहित जीवन का समन्वय उन्हें असंभव सा लगा। आभा गांधी के पति भी इन प्रयोगों से दुखी थे। इस मामले को लेकर उनकी और उनके मित्रों की गांधी जी से नोंक-झोंक भी हुई। उन लोगों का सम्मिलित निवेदन था- 'बापू आप प्रसिध्द महात्मा हैं। आपको इस आपत्तिजनक ढंग से अपनी परीक्षा नहीं लेनी चाहिए। ऐसी परीक्षा मैथुन-क्षम युवक के लिए अधिक उपयुक्त है। 'बापू ने उन सबको सुना, कुछ कहा नहीं' और अपने प्रयोगों को जारी रखा। राष्ट्रीय जीवन में गांधीजी की महत्ता ने इन साधारण लोगों को नैतिक रूप से बौना बना दिया था। अपने प्रतिवाद को वे खुले मैदान में लाने का साहस नहीं जुटा पाए। सुशीला नैयर के अनुसार इन प्रयोगों का ब्रह्मचर्य से कोई संबंध नहीं था। जब वह गांधी जी के बिस्तर पर लेटती थी, तब बापू प्राय: उनसे पीठ दबाने को कहते थे। कभी-कभी दबाव डालने के लिए पीठ पर लेट जाती थी, आरम्भ में इसे ब्रह्मचर्य का प्रयोग कहने का कोई प्रश्न नहीं उठता है। यह केवल प्राकृतिक चिकित्सा का हिस्सा था। बाद में जब लोगों ने (स्त्रियों के साथ) मनु के साथ, आभा के साथ, मेरे साथ- उनके शारीरिक स्पर्श को लेकर सवाल पूछने शुरू किये (तब) ब्रह्मचर्य का आदर्श का प्रतिपादन किया गया।

गांधी जी का आश्रम प्रयोगशाला की तरह था जिसमें तरह-तरह के प्रयोग किये गये। किन्तु स्त्रियों को लेकर जो भी प्रयोग किये गये उन सभी में उनकी संवेदनहीनता और निष्ठुरता स्पष्ट प्रकट होती है। अपने शैया प्रयोग के पहले ब्रह्मचर्य को नापने-जोखने की प्रक्रिया विकसित करने के कई प्रयोग दूसरों पर किये। दक्षिण अफ्रीका में किये गये एक प्रयोग का वर्णन स्वयं गांधी के शब्दों में- 'यह मेरा प्रयोग था। मैंने उन लड़कों को जो शैतानी के लिए जाने जाते थे, भोली युवा लड़कियों के साथ एक ही स्थान पर, एक ही समय में नहाने के लिए भेज दिया। मैंने उन बच्चों को आत्मसंयम का कर्तव्य भली प्रकार समझा दिया था, बच्चों को नहाने के लिए मिलने देना और आशा करना कि वे निष्पाप बने रहेंगे क्या मूर्खता की बात थी? मेरी ऑंखे लड़कियों पर वैसे ही लगी रहती थीं जैसे एक माँ की बेटी पर।' एक दिन किसी ने आकर गांधी जी को खबर दी कि लड़के दो लड़कियों का विशेषकर और बाकी लड़कियों का भी मजाक उड़ाते हैं। गांधी जी लिखते हैं- 'इस खबर से मैं काँप गया, मैंने युवकों को डाँटा। किन्तु यह पर्याप्त नहीं था। मैं चाहता था कि चेतावनी के नाते उन लड़कियों के शरीर पर कुछ चिह्न हों, ताकि किसी भी युवक की कुद्रष्टि उन पर न पड़े और हर लड़की के लिए एक सबक हो कि कोई भी उसकी शुचिता पर हमला करने का साहस न कर पाए। लड़कियाँ कौन सा चिह्न धारण करें जो उन्हें सुरक्षा की भावना देने के साथ-साथ पापी की ऑंखों को भी निस्तेज कर दे? इस प्रश्न ने मुझे रात भर जगाए रखा। प्रात: मैंने लड़कियों को परामर्श दिया कि वे मुझे अपने लंबे बाल काटने दें, लड़कियों ने मेरी बात नहीं सुनी। मैंने बड़ी उम्र की लड़कियों को स्थिति पहले ही समझा दी थी। उन्हें मेरी भावना पर संदेह नहीं था, पर मेरे परामर्श पर विचार करने के लिए वे तैयार नहीं थीं। अंतत: उन्होंने मुझे अपना समर्थन दे दिया।' बाल काटने का सरल समाधान गांधी जी ने एक विपरीत संदर्भ में भी लागू किया। अपने 20 वर्षीय पुत्र के साथ एक विवाहित स्त्री के आपत्तिजनक व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने न केवल दो सप्ताह का उपवास रखा, बल्कि उस विवाहित स्त्री के बाल भी कटवा दिए।

ब्रह्मचर्य के उच्चतम सोपान तक पहुँचने के लिए गांधी जी ने स्त्रियों को किस तरह माध्यम बनाया यह उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट है। पुरुष की कुद्रष्टि का इलाज उन्होंने स्त्री को उस सबसे वंचित करने में पाया जो उसे स्त्री की पहचान देता है। पारंपरिक समाज में स्त्री के बाल काटना उसका सबसे बड़ा अपमान है। ऐसा दंड उन स्त्रियों को दिया जाता है जो समाज से तिरस्कृत कर दी जाती हैं। यह शरीर को दागने के समान है। हैरानी की बात तो यह है कि जो दंड उन्होंने विवाहित स्त्री को दिया वही निर्दोष भोली युवा लड़कियों को भी दिया। व्यक्तित्वहीन,अस्मिताहीन स्त्री ही गांधी जी के लिए सच्ची स्त्री थी। स्त्री की सहनशीलता को महिमामंडित करके उसके शोषण को उसके स्त्रीत्व की परीक्षा में बदल दिया। उन्हें यह सोचने की आवश्यकता नहीं हुई कि यह तथाकथित सहनशीलता वास्तव में उसकी विवशता है- कस्तूरबा के सामने गांधीजी की आज्ञाओं को शिरोधार्य करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। जिस स्त्री में प्रकृतिजन्य भावनाएँ हैं, जो स्त्री प्रतिवाद के स्वर से परिचित है, जिसकी कोई अस्मिता है, उसको गांधी जी ने समूची स्त्री जाति से बहिष्कृत कर दिया। मानो वह स्त्री नहीं कुछ और है। इस कुछ और को पारंपरिक समाज डायन, कुलटा आदि उपाधियों से विभूषित करता है। गांधी जी ने इन शब्दों का प्रयोग तो नहीं किया है, पर उनका आशय कुछ भिन्न नहीं था।
This post is taking by Upadesh Saxena's blog...Actually I am not a cheater.I dont know how to make a link or say Sabhar to releted Blogger. My intension is only to Pramote this post through my Blog.. Sorry Updesh Sir... I am extreamly very Soory to Hurt you.... Asha hai aap mujhe samajh payenge aur maaf Kar denge....
I am realy a great fan of your Sir.........

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

..क्योंकि न्यूज चैनलों के लिए नक्सली ब्रांड नहीं हैं

जितने कैमरे, जितनी ओबी वैन, जितने रिपोर्टर और जितना वक्त सानिया-शोएब निकाह को राष्ट्रीय न्यूज चैनलों में दिया गया, उसका दसवां हिस्सा भी दंतेवाडा में हुये नक्सली हमले को नहीं दिया गया। 6 अप्रैल की सुबह हुये हमले की खबर ब्रेक होने के 48 घंटे के दौर में भी नक्सली हमलों पर केन्द्रित खबर से इतर आएशा और शेएब के तलाक को हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनलों ने ज्यादा महत्व ही नहीं दिया बल्कि अगुवाई करने वाले टॉप के राष्ट्रीय न्यूज चैनलो ने यह भी जरुरी नहीं समझा कि दिल्ली से किसी रिपोर्टर को दंतेवाडा भेज ग्राउंड जीरो की वस्तुस्थिति को सामने लाया जाए। जबकि आएशा की शादी का जोड़ा कहां बना और निकाह के बाद कितनी रातें आएशा के साथ शोएब ने बितायी होंगी और बच्चा गिराने तक की हर अवस्था को पकड़ने में लगातार हर न्यूज चैनल के रिपोर्टर न सिर्फ लगे रहे बल्कि स्क्रीन पर भी ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी के साथ यह तमाम किस्सागोई चलती रही।

दूसरी ओर नक्सली हमले के बाद हमले को लेकर न्यूज चैनलो के स्क्रीन पर जो दृश्य खबरों के रुप में उभरा, वह चिदंबरम का था। फिर मारे गये जवानो के परिजनों के दर्द का था। सीआरपीएफ जवानों की मौत से सूने हुये 76 आंगन की कहानियों का सिरा और अंत रोते-बिलखते परिवारो के शोर से ही उभरा। जिन परिस्थितियों में गांव में किसानी छोड़ सीआरपीएफ के हवलदार और कांस्टेबल बन कर एक नयी जिन्दगी मारे गये 76 जवानों में से 63 जवानो ने शुरु की थी, उनकी जिन्दगी के साथ बीते पांच सालो में कई जिन्दगियां जुड़ गयीं, उनके लिये सरकार के पास कोई योजना है भी या नहीं यह हकीकत सानिया-शोएब की किस्सागोई पर हल्की पड़ गयी। खेत खलिहानो में मेहनत कर किसी तरह दसवीं पास कर कन्याकुमारी का कांस्टेबल राजेश कुमार हो या राजस्थान का कांस्टेबल संपत लाल सभी का सच न्यूज चैनलों के पर्दे पर बच्चों, पत्नी, मां-बाप के रोने बिलखने में ही सिमटा। एक लाइन में रखे ताबूत, उन्हीं ताबूतों को सलामी देते गृह मंत्री पी चिदंबरम। चिदंबरम जहां गये कैमरे वहां पहुंचे। नक्सली समस्या में न्यूज चैनलों के लिये चिदंबरम ही ब्रांड हैं, इसलिये गृह मंत्री 76 ताबूत पर भी हावी थे।

न्यूज चैनलों के लिये चिदंबरम ने हर राह आसान की। चिदंबरम की बाइट और कट-वेज को ही नक्सली संकट बताना-दिखाना मान लिया गया। लेकिन सानिया-शोएब-आएशा की किस्सागोई पकड़ने के लिये रिपोर्टर कैमरे सिर्फ हैदराबाद में नहीं सिमटे बल्कि हैदराबाद के बंजारा हिल्स से लेकर दिल्ली में पाकिस्तानी दूतावास और लाहौर से कराची तक की दूरी पाट रहे थे। वैसे, न्यूज चैनल अगर चाहें तो एलओसी के आर-पार के सच को भी टीवी स्क्रीन पर उतार दें। लेकिन ऐसा क्या है कि देश के बीचोंबीच छत्तीसगढ में 76 सीआरपीएफ जवान मारे गये और न्यूज चैनलों की ओबी वैन या कैमरा टीम पहुंचने में भी दस घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया ? पहले छह घंटो में घायल जवानों को राहत तक नहीं पहुंची ? पहले घायल को अस्पताल का सुख 12 घंटे बाद मिला। तो क्या खबर देने के लिये सरकार से लाइसेंस लेने वाले न्यूज चैनलों का यह फर्ज नहीं है कि वह उन परिस्थितियों को बताये, जिससे दोबारा ऐसी स्थितियां ना बने या फिर नक्सली प्रभावित इलाकों में आदिवासियों और सीआरपीएफ की जिन्दगी कैसे कटती है, उसे उभारे।

लेकिन यह सच भी सानिया की मुस्कुराहट और शोएब के तेवर में गायब हो गया। न्यूज चैनल देखते हुये खबरों का सच कोई कैसे जान सकता है, जब उसे पता ही नहीं होगा कि चिंतलनार गांव, जहां नक्सली हमला हुआ, वह इस पूरे इलाके का एकमात्र गांव है, जो छत्तीसगढ सरकार के सलावाजुडुम कार्यक्रम में शामिल नहीं हुआ। इसलिये इस गांव को सरकार ने भी ढेंगा दिखा दिया। यहां न पानी है न बिजली और न प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। स्कूल की इमारतें जरुर हैं लेकिन शिक्षक नहीं हैं। इसलिये स्कूल की इमारत में ही सीआरपीएफ जवान रुके। हमले के वक्त गांव वाले घरों में सिमट गये लेकिन ये वही गांववाले हैं, जिनके पास दो मील दूर से लाया पानी न होता तो जो सात जवान बच गये, वह भी ना बच पाते।

न्यूज चैनल के जरीये खबरों को जानने वाले यह भी कैसे जान सकते हैं कि सीआरपीएफ जवान रात दो बजे से लेकर सुबह दस बजे तक ही ऑपरेशन को ही अंजाम देते हैं क्योकि दस बजे के बाद इन जंगलों में तापमान चालीस डिग्री पार कर जाता है। पानी पूरे इलाके में नहीं है, इसलिये कैंपों में जमा पानी को ही बोतल में बंद कर गीले कपड़ों से लपेट कर चलते हैं। बुलेट प्रूफ जैकेट पहन नहीं सकते क्योंकि गर्मी और जंगल का रास्ता इसकी इजाजत नहीं देता। हर जवान करीब बीस किलोग्राम बोझ उठाये ही रहता है क्योंकि जंगलो में यह बोझ जीवन होता है। इस बोझ का मतलब है एसएलआर, राइफल, एके-47 या 56 , मोर्टार लांचर और ग्रेनेड।

वहीं इन न्यूज चैनलों को देखने वाला हर भारतीय जान चुका है कि आएशा ने शोएब के साथ निकाह के बाद की पहली रात के कपड़े आजतक सहेज कर रखे हैं। और जरुरत पड़ी तो कपड़ों का भी डीएनए टेस्ट हो सकता है। लेकिन सीआरपीएफ जवानों के पानी के बोतल और बूटों के लिये कोई टेस्ट नहीं है। आएशा का फोन-इन लगातार न्यूज चैनलो में चलता रहा। लेकिन सीआरपीएफ के जवानों पर जब संकट आया तो किसी जवान ने किसी चैनल को मोबाइल नहीं लगाया। मारे गये 76 जवानों में से 28 के पास मोबाइल उस वक्त जेब में थे। लेकिन हर जवान की उंगलियां बंदूक के ट्रिगर पर थी, न कि मोबाइल के बटन पर। अली हसन ने जरुर मोबाइल से अपने घर वालों को बताया कि उसकी जान जा रही है और बच्चों का ख्याल रखना। लेकिन यह सब न्यूज चैनल के स्क्रीन पर नहीं है।

दिल्ली से जगदलपुर-रायपुर और फिर दिल्ली तक न्यूज चैनलों का कैमरा अगर घूमा तो उसकी वजह चिदंबरम और रमन सिंह ही रहे, जो न्यूज चैनलों के लिये ब्रांड हैं। इसलिये जब एक ब्रांड ने इस्तीफे की बात कही तो दूसरे ब्रांड ने बिना देर किये इस्तीफे को बेकार करार दिया और जवानों के लिये मौत के बाद का जीवन का फिर यही चिदंबरम और रमन सिंह बन गये। क्योंकि जवान की मौत तब तक मायने नहीं रखती जब तक कोई मंत्री न पहुंचे। न्यूज चैनल के दर्शक कैसे जानेंगे कि जवानों की मौत इतनी सामान्य है कि चिंतलनार में नक्सली हमले की पहली जानकारी सुबह 6.10 पर दोरणापार के एसडीपीओ ओम प्रकाश शर्मा को मिली तो उन्होंने भी इसे सामान्य घटना माना। सामान्य का मतलब है बारुदी सुरंग का फटना और दस-बारह जवानों का मरना। और इतनी मौतों पर कोई विधायक भी नहीं आता है। हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनलों के जरिये कैसे दर्शक जान पायेगा कि चिंतलनार से 185 किलोमीटर दूर जगदलपुर में सीआरपीएफ की 62 वीं बटालियन के बचे जवानो में गुस्सा पनप रहा है कि राजनेता और दिल्ली के एसी कमरो में बैठे नौकरशाह बयान दे रहे हैं कि जवान गलत रास्ते पर निकल पड़े इसलिये नक्सली हमला हो गया। बचे जवानों में गुस्सा है कि उन्हें बताया गया है कि आपात जरुरत के लिये चौपर मौजूद है, लेकिन जब जवान खून से लथपथ हो गये तो उनकी सुध लेने के लिये चौपर नहीं था।

दर्शकों को कौन दिखायेगा कि जंगलों में सीआरपीएफ जवान जहां रुकते हैं, पहले उसे चंद घंटों के लिये आराम करने लायक बनाते हैं। बमुश्किल जगह मिलती है, और उसे रुकने लायक बनाते बनाते अगले पड़ाव के लिये निकलने का वक्त आ जाता है। क्योकि कमांडेंट को उपर से आदेश है....रिजल्ट चाहिये। लेकिन न्यूज चैनलो पर यह सच नहीं दिखाया जा सकता क्योंकि गृह मंत्रालय की एडवाइजरी है- नक्सल समस्या को सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से न जोड़ें। मगर सानिया -शोएब के निकाह पर सरकार की कोई एडवाजरी नहीं है क्योंकि ये ब्रांड हैं।

BSP leader's murder caught on camera

LUCKNOW: In a daring murder, a village pradhan and husband of a sitting district panchayat member was shot dead from a point blank range within the district collectorate in Gonda in full public view on Wednesday evening. The victim was sitting on the stage with a dozen others at a public meeting organised to observe the Baba Saheb Bhim Rao Ambedkar's birth anniversary, when the incident took place.

Despite a crowd of over 500 persons, including collectorate staff and police, present at the venue, the lone assailant reportedly pumped in two bullets from behind and escaped unchallenged. A couple of policemen present in the vicinity of the scene of crime, however, reached the site well after the assailant had escaped and rushed the victim to hospital where he was declared brought dead.

Reports reaching the director general of police (DGP) headquarters said that the middle-aged victim - Hanuman Saran Shukla - a BSP leader and pradhan of Mahengipurwa village under Tarabganj police station of Gonda district, had come to attend the function being held within the collectorate compound near Ambedkar crossing. He was sitting on the stage along with his wife - a sitting member of district panchayat as other guests were addressing the gathering when two sounds of gunshots filled the air.

Though initially none could understand what had happened, a couple of seconds later Hanuman slumped on the stage floor and people around him noticed a youth carrying a handgun, fleeing the scene when it dawned upon them as to what had happened. Chaos prevailed thereafter as people in the audience tried to escape leading to a virtual stampede. Hanuman was then rushed to district hospital by two constables who arrived at the scene shortly thereafter but the effort proved futile as the doctors at the district hospital pronounced him dead upon arrival.

Though senior police officers rushed to the site immediately after the news of the sensational crime came in, there was nothing much with the police with regards to the motive for the murder or the identity of the assailant, till late on Wednesday evening. Police were however quick to announce that the slain pradhan had a criminal past. Exact details of the cases in which Hanuman was allegedly involved in, were being collected, Gonda police said.

तुम जो कहो वह सब सही, हम जो कहें वह सब गलत

अम्बेडकर जयन्ती समारोह के दौरान गोण्डा में बसपा के मंच पर पार्टी के पदाधिकारी हनुमान शरण शुक्ला की सरेआम हत्याकर दी गई।
इसी के बाद पार्टी की ओर से बढ़ चढ़ कर सफाई अभियान शुरू हुआ। मज़े की बात यह है कि इसके लिये प्रमुख सचिव ग्रह कुवंर फतेह बहादुर तथा डी0 जी0 पी0 करम वीर सिंह मैदान में उतर गये और प्रेस-कान्फ्रेन्स में इस प्रकार बोले जैसे पार्टी-प्रवक्ता बयान दें। उन्हों ने मृतक के संबंध में कहा कि वह न तो बसपा का सदस्य था और न ही वह पार्टी की किसी समिति से जुड़ा था, वह हिस्ट्रीशीटर था, उसकी हत्या रंजिश में की गई। जब यह सवाल हुआ कि बसपा से नहीं जुड़ा था और तो मंच पर कैसे बैठा था ? और हथियार बंद लोग मंच तक कैसे पहुँचे ? इन के उत्तरों के लिये अधिकारी-गण बग़लें झांकने लगे।
अब दुसरा बयान मृतक की पत्नी पंचायत सदस्य मंजु देवी तथा पुत्री प्रियंका शुक्ला का देखिये-पत्नी ने बताया कि वे बसपा ब्राह्मण भाई चारा समिति के तरब गंज विद्यान सभा क्षेत्र के अघ्यक्ष थे, उनको यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वे ब्राह्मण समाज को बसपा के पक्ष में एकजुट करें। यह भी बताया की वह जयन्ती के मौके पर तीन सौ से अधिक गाड़ियों द्वारा हजारों लोगों को लेकर गये थे। पत्रकारों से बातचीत में रूँधे गले और बह रहे आसुंओ के बीच कहा कि दुःख की घड़ी में शासन उन्हें बसपा कार्यकर्ता न होने की बात कहकर उनके ज़ख्मों को कुरेद रहा है। पुत्री ने कहा कि बसपा के प्रत्येक र्कायक्रम में उनकी बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी थी।
दोनों बयानों की तौल-नाप आप खुद करें। मैं तो बस मृतक की पत्नी और पुत्री को यह कहूँगा कि वे बहन कु0 मायावती और शासन प्रशासन के गुरगों को मुखातिब करके यह शेर पढ़ दें-

बात तुम्हारी आज तक कोई हुई है कब गलत?
तुम जो कहो वह सब सही, हम जो कहें वह सब गलत।

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

इन्साफ हो किस तरह कि दिल साफ नही है



इस दहर में सब कुछ है पा इन्साफ नहीं है।
इन्साफ हो किस तरह कि दिल साफ नही है।

परमाणु अस्त्रों के सम्बन्ध में अनेक मंचों पर जब चिंता जताई जाती है तब हमकों एक कहानी याद आ जाती है-कुछ लोग एक मुर्दा उठायें हुए शमशान की ओर जा रहे थे, मोटा ताजा होने के कारण जब उसके भारीपन का एहसास हुआ तो उपाय सोचने हेतु उसे उतारा गया, फिर मुंह की ओर से कफ़न खोला, बड़ी बड़ी मूँछे देखकर एक सज्जन ने राय यह दी कि इसकी मूँछें उखाड़ लो।
अस्त्रों के अप्रसार, निरस्त्रीकरण आदि के अनेक समझौते हुए, एन0 पी0 टी0, सी0 टी0 बी0 टी0 की संधियाँ काफी पहले की हैं, परन्तु समस्या जहाँ थी वही अब भी हैं। बात यह है कि हुल्लड़ वही देश मचाते है जिनके पास विश्व भर के परमाणु हथियारों का 95 ज़खीरा मौजूदा है। यह हुल्लड़ भी इसलिये होता है कि वे दुसरो पर निशाना साधते रहें और किसी को उनकी ओर उंगली उठाने का मोका ने मिले।
आप ग़ौर करें कि चीन के पास 200, इस्राईल के पास 200, भारत, पाकिस्तान के पास 100-100 परन्तु अमेरिका व रूस के मिला कर 22 हजार से अधिक परमाणु हथियार हैं।
अप्रेल 10 के दुसरे सप्ताह में इस मामलें पर दो स्थानों पर र्वातायें हुईं।
सप्ताह के आरम्भ में चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग में अमेरिका राष्ट्रपति ओबामा तथा रूसी राष्ट्रपति मेदवेदेन ने परमाणु हथियारों में 30 कटौती के समझौते पर हस्ताक्षर किये। यह संधि 1991 की स्र्टाट संधि (स्ट्राटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी ) की जगह लेगी।
सप्ताह के अंत में नाभिकीय सुरक्षा सम्मेलन अमेरिका ने आयोजित किया, जिसमें भारत समेत 47 देशों नें परमाणु प्रौद्योगिकी था सूचना के गलत हाथों में न पड़ने देने का संकल्प लिया। ताकि सामग्री सूचना एवं तकनीक आतंकियों तक न पहुंचे। इस सम्मेलन से कुछ दिन पूर्व अमेरिकी विदेशी मंत्री हिलेरी किलंटन ने एक अमेरिकी यूनिवर्सिटी में भाषण देते हुए भारत पाकिस्तान को धमकाया यह कहते हुए कि इन्हीं देशों ने परमाणु संतुलन बिगाड़ा है। इसके लिये यह मुहावरा है उल्टे चोर कोतवाल को डांटे। इस भाषण में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात यह जरूर कही कि परमाणु अप्रसार संधि के तीन छोर हैं, पहला निरस्त्रीकरण, दूसरा अप्रसार, तीसरा परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण इस्तेमाल।
हथियारों को घटाना, उनका अप्रसार, गलत हाथों में न पड़ना, इन सब बातों से बेहतर तो यही था कि मूल मुद्दे निरस्त्रीकरण पर दो टूक बाते की जाती। 1945 में इसकी भयावह तस्वीर सामने आई थी, जब अमेरिका ने नागासाकी शहर पर बम छोड़ा जिससे 90 हजार लोग मरे, फिर हिरोशियमा पर बम ब्लास्ट में एक लाख चालीस हजार जाने गई तथा 69 फीसदी इमारते नष्ट हो गई।
यह सच मानिये कि परमाणु प्रसार के मामले में अमेरिका की सब से बड़ा अपराधी है, 1945 के बाद से आज तक 65 वर्ष हो चुके हैं परन्तु मुख्य मुद्दे से ध्यान हटाने की बाते होती रहती हैक्ं। यदि पूर्ण निरस्त्रीकरण लागू हो जाये तो सभी समस्यायें सुलझ जायें। अब उत्तर कोरिया और ईरान यदि अपराधी हैं तो उन्हें सजा जरूर दीजिये लेकिन इस्राईल का दोष क्यों नजर नहीं आता?

नक्सलवाद का जवाब भ्रष्ट पंचायती राज नहीं हो सकता


आज पूरा देश नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव से परेशान है ऐसे में देश के मुखिया का चिंतित होना भी लाजिमी है.लेकिन सिर्फ चिंतित होने से तो कुछ होनेजानेवाला हैं नहीं. इसके लिए प्रभावी कदम उठाने पड़ेंगे और कोई सरकार प्रभावी कदम तभी उठा सकती है जब उसे ग्रास रूट लेवल पर हालात क्या हैं की समझ हो या जानकारी हो.लेकिन लगता है हमारे देश के वर्तमान मुखिया को इस बात की जानकारी नहीं है कि पंचायती राज के दौरान पंचायतों में क्या हो रहा है.नहीं तो ऐसा वे बिल्कुल भी नहीं कहते कि हम नक्सलवाद का जवाब पंचायती राज से देंगे.दरअसल पंचायतों में जो लूट का खुला खेल चल रहा है उससे जनता का नहीं बल्कि ग्राम प्रधानों और उनके चमचों का कायाकल्प हो रहा है.प्रधानमंत्रीजी अगर गांवों में जाएँ तो उन्हें पता चलेगा कि बहुप्रचारित मनरेगा के तहत दी जानेवाली लगभग पूरी राशि को किस तरह फर्जीवाड़े की सहायता से प्रधानजी डकार जा रहे हैं.किसी भी योजना में सरकार के लिए सिर्फ राशि उपलब्ध करवा देना ही काफी नहीं होता बल्कि उस धन का उपयोग उचित तरीके से हो रहा है कि नहीं यह देखना भी सरकार का ही काम है.पूरे देश में गरीबों के बढ़ते समर्थन के बल पर दिन दूनी रात चौगुनी की गति से बढ़ रही नक्सलवाद की समस्या का मुकाबला भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चुके पंचायती राज के माध्यम से भला कैसे किया जा सकता है?यह तभी नक्सलवाद की काट बन सकता है जब इसे भ्रष्टाचार से मुक्त कर दिया जाए जिससे गरीबों को वास्तव में लाभ हो उन्हें लगे कि भारत सरकार को उनकी भी चिंता है और वे भी देश के लिए कुछ महत्व रखते हैं और देश के लिए कुछ कर सकते हैं.वर्तमान पंचायती राज में कुछ लोग भ्रष्टाचार की माया से गरीब से बहुत ही धनी होते जा रहे हैं जबकि ज्यादातर गरीब जनता पहले भी मूकदर्शक थी और अब भी मूकदर्शक है.लेकिन वे चुप भले ही हों उनके अन्दर नाराजगी का एक ज्वालामुखी उबाल मार रहा है और उन्हें बहकाने के लिए नक्सली नेता उपलब्ध हैं ही.इसलिए मनमोहन जी ड्राईंग रूम में बैठकर योजनायें और बातें बनाना छोड़िये और ग्रास रूट लेवल पर जो समस्याएं हैं का अध्ययन करिए और उनका समाधान खोजिये.अन्यथा एक दिन आपकी ही तरह शाहे बेखबर रहे बहादुर शाह जफ़र की तरह आपका शासन भी दिल्ली से पालम तक रह जायेगा.

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

‘इसलाम आज इतिहास की सबसे बड़ी समस्या है’



This is not my own view.Here are a interview of a dutch Writer.....


डच लेखिका और राजनीतिज्ञ अयान हिरसी अली वाशिंगटन डीसी स्थित अमेरिकन इंटरप्राइज इंस्टीट्यूट की फेलो हैं. उनकी ‘इनफिडेल’ नामक संस्मरणों की किताब काफी चर्चा में रही है. इसलाम की आलोचनाओं के कारण कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं हिरसी हाल ही में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल हुईं. सुरक्षा कारणों से उनके आने की पहले से कोई सूचना नहीं दी गई थी. गौरव जैन से उनकी बातचीत के प्रमुख अंश:

क्या आपको लगता है कि इसलाम की सार्वजनिक तौर पर आलोचना से पहले इसलाम से अलग होना जरूरी है?

इसलाम से बाहर आने का मेरा सफर यह दिखाता है कि निजी तौर पर किसी मुसलिम मर्द या औरत के लिए अपने विचारों में बदलाव लाना मुमकिन है. मुझे यह सहज और सरल भाषा में साफ करना पड़ता है कि मेरे मां-बाप ने मुझे नैतिक मूल्यों का यह ढांचा दिया था, मैंने इसलिए इसे छोड़ दिया और ये हैं वे नए नैतिक मूल्य जो मैंने अपनाए हैं. अगर आप खुद ही इस बारे में साफ नही हैं और भ्रम में पड़ गए तो आपका मकसद पूरा नहीं हो पाएगा और यह केवल कट्टरपंथियों को ही फायदा पहुंचाएगा, क्योंकि उनका नजरिया और इसलाम को फैलाने का उनका मकसद बहुत साफ है. वे आपको बताते हैं कि यह हलाल है, यह हराम है. आपको काफिरों से लड़ना चाहिए और अगर वे अपनी इच्छा से धर्म नहीं बदलते तो उन्हें मार डालो या उनसे बचो. पतितों के लिए इस तरह की शर्तें हैं. वे इस बारे में बहुत साफ हैं कि आपको इसलाम क्या करने को कहता है. इसलिए आपको एक साफ रुख अपनाते हुए बताना होगा कि वे मूल्य क्यों गलत हैं.

क्या आप इसलाम के प्रसार को एक समस्या के तौर पर देखती हैं?

आज यह इतिहास की सबसे बड़ी समस्या है. अगर हम आतंक और हिंसा को छोड़ भी दें तब भी. यह एक बंद दिमाग का आदमी पैदा करता है, क्योंकि यह आपको खुद सोचने की इजाजत नहीं देता. आपको एक आदमी का अनुसरण करना होता है जो आपको हराम और हलाल चीजों के बारे में बताता है. इसलाम मौत के बाद की फिक्र करने को कहता है. जबकि जरूरी यह है कि हम जिंदगी के लिए एक दर्शन की रचना करें, उस जिंदगी के लिए जो आज सामने है. मुसलिम जगत इसलिए पीछे है क्योंकि वह आज की बजाय मौत के बाद के जीवन और कयामत के बारे में चिंतित रहता है.

आज बुरका बड़ी समस्या क्यों है?

पश्चिम में जब भी बुरके की चर्चा होती है, दुर्भाग्य से बहस को कपड़े के एक टुकड़े तक सीमित कर दिया जाता है. जैसे कि आपको अपने बाल या आंखें ढकनी चाहिए या नहीं वगैरह. जबकि हमें इसके असली निहितार्थ के बारे में बात करनी चाहिए. बुरके के पीछे का विचार यह है कि नारी शरीर लुभावना है, यह मर्द की काम भावना को उकसाता है. और अगर ऐसा होता है तो मर्द खुद पर काबू नहीं रख सकता. इसलिए सबसे अच्छा तरीका है कि औरत को ही ढक दो. अब जो औरतें जो इसे गर्व से पहनती हैं वे खुद से पूछें -क्या किसी मर्द को उसकी काम भावना से बचाना मेरी जिम्मेदारी है या उसे खुद अपनी इच्छाओं और तकाजों पर काबू रखना सीखना चाहिए? अब जैसा कि हम भारत, चीन, पश्चिम में देख रहे हैं, मर्द अपने तकाजों को नियंत्रित करने में सक्षम हो रहे हैं और इस तरह बुरका निरर्थक बन रहा है. एक दूसरी वजह यह है कि आप देखेंगे कि एक राजनीतिक नजरिए की अभिव्यक्ति के रूप में मुखर, शिक्षित कामकाजी औरतें भी बुरका पहनती हैं. यह राजनीतिक नजरिया यह है कि इसलाम एक राजनीतिक सिद्धांत है, यह सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत है और शरिया कानून लागू होना चाहिए. यह खुद को एक झंडे से ढकने जैसा है, यह एक भव्य आडंबर है.

यूरोप में मुसलमानों के तुष्टीकरण की तुलना अमेरिका से कैसे करेंगी?
अमेरिका और यूरोप के मुसलमानों में फर्क यह है कि अमेरिकी मुसलमानों का शैक्षिक स्तर यूरोप के मुकाबले बेहतर है. लेकिन तब भी अमेरिका में उग्रवाद और जिहादीपन अधिक है, जो यहां खुल रहे इसलामी सेंटरों के रूप में दिखता है. इसलाम में दो समूह हैं. एक हिंसा को भी साधन मानता है. उधर, तारिक रमजान जैसे लोग क्रमिकवाद में यकीन रखते हैं-अपने उद्देश्यों को लोकतांत्रिक तरीकों से हासिल करने में. मुझे लगता है कि अल कायदा हिंसा का इस्तेमाल करना जारी रखेगा और यह रास्ता इसलाम के लिए आत्मघाती है.

ये सड़क कहीं और की लगती है


अगर सड़क अमेरीका के बॉस्टन की हो और ज़िंदगी बिहार के बाराचट्टी की, तो दोनों के बीच जुगलबंदी थोड़ी मुश्किल हो सकती है.

गया से निकलकर जैसे ही झारखंड के राष्ट्रीय राजमार्ग पर पहुंचा, तो अचानक से लगा अमेरिका के बॉस्टन या न्यू इंग्लैंड इलाक़े में पहुंच गया हूं अक्तूबर के महीने में.

उन दिनों वहां की चौड़ी-चिकनी सड़कें मानो रंगों में नहाई होती हैं. पत्तों के रंग ऐसे लगते हैं मानो ऊपरवाले ने स्वर्ग से लाखों रंग-भरी पिचकारियां दागी हैं.

मार्च में झारखंड टेसू के रंगों में लिपटा होता है. बल खाती हुई मख्खन सी इन सड़कों के किनारे किनारे पलाश के ये फूल सुहागरात के बिस्तर के इर्द-गिर्द लटकी वेणियों की तरह नज़र आते हैं.

ज़ुबान पर अचानक एक बात आती है - ये सड़कें कहीं और की लगती हैं.

कंप्यूटर की भाषा का इस्तेमाल करूं तो लगता है जैसे किसी ने Ctrl C दबाकर Ctrl V वी दबा दिया है यानि कॉपी और पेस्ट.

जी हां, ये सड़कें कहीं और की लगती हैं.

क्योंकि जैसी ही गाड़ी थोड़ी आगे बढ़ती है. किनारे नज़र आते हैं टूटे पुराने घर, जंगल से लकड़ी के गठ्ठर लेकर आती औरतें, सड़क के बीचोंबीच खूंटे से निकलकर भागी बकरी, खेलते हुए अधनंगे बच्चे...किस्मतवाले क्योंकि उन्हीं की उम्र का एक बच्चा बगल के ढाबे में प्लेंटें धो रहा है. उसके खेलने के दिन अभी से ही ख़त्म हो गए.

सड़क के बीचोबीच घिसटता हुआ नज़र आता है एक भिखारी जो शायद इन्हीं सड़कों पर अपनी दोनों टांगे खो चुका है. लाल जामे में लिपटी एक अंधी औरत आंचल फैलाकर मांग रही है कुछ पैसे. उसके लिए रूकते हुए किसी को नहीं देखा मैने.
सड़क ने मानो चीरा लगा दिया है लोगों के घरों और खेतों के बीच. एक ओर घर हैं दूसरी ओर मालिकों के खेत.

चार लेन की सड़क पार करना आसान नहीं...लेकिन भूखे पेट सोना और मुश्किल. ट्रकों की रफ़्तार इतनी तेज़ की गरीब की हड्डियां अक्सर बिखरती रहती हैं.


जहां गांव की सुकून से चलती हुई पगडंडियाँ इन सड़कों को खरोंचती हैं वहां हर दिन टकराव होते है.

सुना था सड़कों की जात नहीं होती, वर्ग नहीं होता. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. जो इन सड़कों के नखरे नहीं उठा सकता, उसे अपनी नज़र नीची रखनी होगी.
ये सड़कें काबू में तभी आती हैं जब आम आदमी भीड़ में तब्दील हो जाता है. रामनवमी और मुहर्रम पर इन्हें झुकना होता है. चार लेन की अकड़ दो लेनों में बदल जाती है. हवा से बातें करनेवाली मोटरगाड़ियां सहम कर रेंगना शुरू कर देती हैं.

यकीन मानिए अमेरीका हो या जर्मनी, चीन हो या ब्रिटेन, राजमार्गों पर जुलूस निकलते न कहीं देखा न कहीं सुना. ऐसा बस भारत में हो सकता है. क्योंकि यहां ऐसा नहीं हुआ तो उसे ग़लत माना जाता है.

ये सड़कें भारत को बहुत दूर ले जाने के लिए बनी हैं. लेकिन लोगों को उन पर चलने के काबिल भी बनाना होगा. दोनों के बीच फ़ासला अभी बहुत बड़ा है.

दिल्ली के जनपथ पर गोरी विदेशी लड़कियां जब आती हैं तो उनकी और सभी की नज़र खींच जाती हैं...कभी लिबास के कारण तो कभी इसलिए कि वो भीड़ से अलग नज़र आती हैं. इन सड़कों का भी कुछ ऐसा ही है...बला की ख़ूबसूरत हैं, कभी चिढ़ाती हैं कभी उम्मीदें जगाती हैं लेकिन अभी मिलन मुश्किल लगता है.

ये सड़कें कहीं और की लगती हैं.

पाकिस्तान पहुँचीं सानिया


भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा अपने पति और पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के साथ भारत से पाकिस्तान पहुँच गई हैं.
पति और पत्नी जब मुंबई से कराची पहुँचे तो जिन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सिंध प्रांत के खेल मंत्री मोहम्मद अली शाह, मुख्यमंत्री के सलाहकार राशिद रब्बानी, वक़ार मेहदी सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों ने उनका भव्य स्वागत किया.

सानिया ने पत्रकारों को बताया कि वे पहली बार कराची पहुँची हैं और उन्हें यहाँ पहुँच कर बहुत अच्छा लगा रहा है.

खेल मंत्री ने नव विवहित जोड़े को फूल और सिंधी अजरक यानी चादर तोहफ़े में दी. सानिया और शोएब जब विमान से उतरे तो उस समय हज़ारों लोग दोनों की एक झलक देखने केलिए बेताब थे.

बड़ी संख्या में लोग हवाई अड्डे पर पहुँचे. सुरक्षा व्यवस्था के कड़े प्रबंध किए गए थे और पत्रकारों सहित किसी को भी शोएब और सानिया से मिलने नहीं दिया गया.

लोगों ने दोनों के देखने के लिए काफी कोशिश की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल सकी.

दोनों कुछ घंटे हवाई अड्डे पर रहने के बाद इस्लामाबाद के लिए रवाना हो गए. सानिया के साथ भारत से उनकी माँ भी पाकिस्तान पहुँची हुई हैं.

शोएब ने पत्रकारों को बताया कि वे करीब एक हफ्ते तक पाकिस्तान में रहेंगे जिसके बाद में दुबई जाएँगे.

उधर प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी ने सरकारी अधिकारियों को आदेश दिया है कि सानिया और शोएब को इस्लामाबाद पहुँचने पर विशेष सरकारी अतिथि का दर्जा दिया जाए.

सानिया और शोएब इस्लामाबाद के बाद शोएब के शहर सियालकोट जाएँगे जहाँ 25 अप्रैल को रिसेप्शन होगा.

ग़ौरतलब है कि सानिया और शोएब का निकाह कई विवादों के बाद 12 अप्रैल को हैदराबाद में हुआ था.

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

रंगबाज पूरबियों को ले डूबी रंगदारी


दिल्ली के शातिर शोहदे अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पलते-बढ़ते हैं तो मुंबई के माफिया डॉन पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वाचल) की नर्सरी में आकार लेते हैं. यकीन मानिए, यही सच है. बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध में स्वतंत्रता संग्राम की कमान संभालने वाले व उत्तरा‌र्द्ध में देश को नेतृत्व प्रदान करने वाले अपने उत्तम प्रदेश अर्थात उत्तर प्रदेश की इक्कीसवी सदी की शुरुआत में यही पहचान है. ग्लोबलाइजेशन के दौर में मेच्योरिटी की ओर बढ़ रहा है भारतीय लोकतंत्र. ऐसे में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए पूरबिया प्रोफेशनल क्रिमिनल कम पॉलिटिशियन जनतंत्र का नया मुहावरा गढ़ने में मशगूल हैं. मंडल-कमंडल के झंझावातों को झेल नई जमीन तलाश रहे पूर्वाचल के सामाजिक व्याकरण के सिलेबस में भी आमूल चूल परिवर्तन हुआ है. क्लासिकल सामंतवाद के रंगमंच पर सिर्फ पात्र बदले हैं, पटकथा वही है.
हाल के दिनों के आपराधिक रिकार्डो पर गौर करें तो पता चलेगा कि पूर्वाचल के कई जिले अपराधियों के अभ्यारण्य में तब्दील हो चुके हैं. हर दूसरे-तीसरे दिन यहां कोई न कोई टपका दिया जाता है. गैंगवार के मामले में भी यहां के कई शहर अब मुंबई व सिंगापुर से सीधे ताल ठोक सकते हैं. सर्व विद्या की राजधानी मोक्षदायिनी काशी अब अपने रंगदारों के बूते पहचानी जा रही है. कहते हैं भोले नाथ की नगरी काशी के वासी मिजाज से भौकाली होते हैं. जेब में फुटी कौड़ी न भी हो तो रंगबाजी से बतियाना उनकी फितरत है. किसी जमाने में पूरबिये किसी दिग्गज राजनेता, साहित्यकार या किसी शिक्षाविद् के नाम की धौंस जमाया करते थे. अब किसी न किसी माफिया डॉन तक पहुंच की हेकड़ी बघारते हैं. अंडरव‌र्ल्ड में बढ़ रही उसकी साख किसी भी भले मानुष के पेशानी पर बल डाल सकता है. वैसे यह अंदर की बात है. सच तो यह है कि रंगदारी ने रंगबाज पूरबियों का बंटाधार कर दिया है.
अपने मिजाज की त्रासदी झेल रहा है पूर्वाचल. प्राकृतिक तौर पर अपराधी न होते हुए भी अपने अह्म की तुष्टि के लिए पूरबियों की नई पीढ़ी यदा-कदा कानून हाथ में लेने से गुरेज नहीं करती. इसके बाद कुछ मनबढ़ लंबे हाथ मारने से भी नहीं चुकते. ऐसे ही कुछ युवा अपराध की दलदल में फंसते जा रहे हैं तो कुछ खुद को मॉडर्न दिखाने की ललक में अपराधियों के मोहरे बनते जा रहे हैं. ये रंगबाज दीमक की तरह धीरे-धीरे पूर्वाचल की संपन्नता व व्यापार को चाटते जा रहे हैं. नतीजा आपके सामने है.पूर्वाचल में और उसमें बढ़ते अपराध कोढ़ में खाज का काम कर रहे हैं. हत्या, लूट, रंगदारी, अपहरण व बलात्कार सरीखे वारदातों की बढ़ती तादाद ने पूर्वाचल का इतिहास-भूगोल ही नहीं, अर्थशास्त्र को भी डावांडोल कर दिया है.
इस साल के शुरुआत के तीन महीनों में हत्या व लूट की तकरीबन दर्जन भर वारदातों को अकेले वाराणसी शहर में ही अंजाम दिया जा चुका है. गुजरे साल का लेखा-जोखा तो गोया खून से ही लिखा गया था. हत्या, लूट व अपहरण सरीखी वारदात अब पूर्वाचल के लिए एक आम बात है. ऐसी विषम परिस्थितियों में कोई उद्योगपति या व्यवसायी यहां आकर कारोबार करने के विषय में भला कैसे व क्यों सोचेगा? कई कारणों से पूर्वाचल की अपनी महत्ता है. मगर जिन विषम परिस्थितियों से मुखातिब है पूर्वाचल, दयनीय कानून-व्यवस्था उसकी सारी उपलब्धियों पर पानी फेरने के लिए काफी है. जान है तो जहान है. यहां के समर्थ उद्योगपति व व्यवसायी पलायन को लाचार हैं. जो किन्ही कारणों से पलायन नहीं कर सकते, वे भी पुलिस व प्रशासन के भरोसे नहीं, उन आततायियों के रहमोकरम पर ही रोजी-रोटी कमा रहे हैं, जो उनकी सुपारी हाथ में लिए घूम रहे हैं.
माफिया डॉन सुभाष ठाकुर ने पिछले दिनों एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि आपराधिक प्रतिभाओं के लिहाज से उर्वरा है पूर्वाचल की धरती. सबसे बड़ी बात यहां के युवा अपराधी कम से कम अपने आका से विश्वासघात नहीं करते. यही उनकी पूंजी है. इसीके बूते अंडरव‌र्ल्ड में इस तबके के पूरबियों की धाक है. वैसे पूर्वाचल में बढ़ रहे अपराध का एक अहम कारण भयंकर बेरोजगारी भी है. आईपीएस सुजीत पांडेय ने हाल में दिए एक इंटरव्यू में कहा कि बेरोजगारी पूर्वाचल में बढ़ते अपराध का बुनियादी कारण है. मिजाज से रंगबाज व भौकाली होने के कारण इस क्षेत्र के युवकों का एक तबका व्हाइट कलर जॉब की ताक में रहता है. जाहिर है सभी की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकती. ऐसी हालत में वे छोटे-मोटे व्यवसाय की बजाय शॉर्टकट रास्तों के जरिए फटाफट अपना लक व लुक दोनों बदलना चाहते हैं.
उदार अर्थव्यवस्था व भूमंडलीकरण की बदौलत काशी व उसके आसपास के शहरों में कमाने के जरिए भले न बढ़े हों, सपने व महत्वकांक्षाएं जरूर युवा पीढ़ी के दिल-दिमाग में पैठ बनाईं हैं. इन्हें हासिल करने की ललक के चलते लोगों के खर्चे बेहिसाब बढ़े हैं. संबंधित तबका इन खर्चो को पूरा करने के लिए बेजां हरकतें करने से बाज नहीं आता. गलत संगत में पड़कर कई भले घरों के लड़के घोड़े पर उंगलियां टिकाए यायावरी जीवन बिताने को मजबूर हैं. महज ब्रांडेड कपड़े-जूते, मोबाइल व थोड़े बहुत नोटों के लालच में कई लड़के सत्या ब्रांड शूटर्स बन गए हैं. अब उनके पास सब कुछ है, सिवाय चैन की नींद के. रही सही कसर पूरी कर देता है पड़ोसी राज्य बिहार. न सिर्फ असलहे अपितु कोच भी मुहैया करवाता है बिहार. जरूरत पड़ने पर पुलिस से छिपने के लिए वहां शरण भी उपलब्ध है. वैसे ऐसे तत्वों को संरक्षण प्रदान कर अपना उल्लू सीधा करने से पूर्वाचल के राजनेता भी बाज नहीं आते. जी हां, पूर्वाचल की बिगड़ी तबीयत के लिए कई कारक ग्रह मौजूद है. विडंबना तो यह है कि काशी समेत समूचे पूर्वाचल की तीमारदारी का अहम दायित्व जिन्हें सौंपा गया है, उनमें से कई जनप्रतिनिधियों का टांका सीधे अंडरव‌र्ल्ड से जुड़ा है. जो सीधे नहीं जुड़े हैं, वे भी घुमा फिरा कर थोड़ी बहुत मोंगाबो को खुश करने की जुगत भिड़ाने की हैसियत रखते हैं. जाहिर है ऐसे हालात में काशी की हिफाजत तो इसके शाश्वत कोतवाल (भैरो बाबा) ही कर सकते हैं.
कोलकाता, दिल्ली, मुंबई हो या मारीशस व त्रिनिदाद, हाड़तोड़ मेहनत के लिए अभ्यस्त पूरबिए जहां भी गए वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन उभरे. लगभग दस साल पहले नई दिल्ली के मावलंकर हाल में अखिल विश्व भोजपुरी सम्मेलन के सालाना जलसे को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने कहा था महानगर ही नहीं, बीहड़ में भी आर्थिक तौर पर स्वावलंबी हो परचम लहराने का माद्दा भोजपुरी भाषियों में है, मगर दीप तले अंधेरे की कहावत चरितार्थ करता है इनका अपना घर, अपना इलाका. क्या वजह है कि यहां की प्रतिभाएं अन्यत्र रंग दिखाती हैं, जबकि यहां लाचार दिखती हैं? ये सवाल अब भी अनुत्तरित है.

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

जब-जब आघात लगा, जब-जब किसी ने पीठ में छुरा घोंपा, तब-तब मैं रोया।


आज की पत्रकारिता
आज की पत्रकारिता में सब कुछ फास्‍ट फूड ज्‍वायंट जैसा हो गया है। धैर्य ‍बिलकुल भी नहीं है। आज के बच्‍चों को ज्‍वाइन करने के तीसरे दिन ही पीएम की बीट चाहिए, क्राइम बीट चाहिए। इसका कारण है कि आजकल बच्‍चों की न तो सैद्धान्‍ति‍क ट्रेनिंग होती है और न ही मानसि‍क। बल्कि नट-वोल्‍ट को फिट करने की ट्रेनिंग होती है। भाषा और पढ़ाई से ज्यादा अब जरूरत इस बात की है कि आपको क्वार्क एक्सप्रेस, फोटो शाप, वीडियो एडिटिंग, वाइस ओवर, लेआउट इत्यादि आता है या नहीं। पत्रकारिता से जन-सरोकार कम होता जा रहा है। मगर हमेशा ऐसा नहीं होगा। अल्टीमेटली, कंटेंट ही रूल करेगा। पत्रकारिता के कई फास्ट फूड ज्वायंट फिलहाल बंदी के कगार पर हैं। चलेगा वही जो टिकेगा और टिकेगा वही जो इस देश की आम जनता और अपने पाठक की बात करेगा।
पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को राष्ट्रपति का एट होम कैसे होता होगा। किस स्तर के लोग वहां बुलाए जाते होंगे। इत्यादि-इत्यादि। जब ये इच्छाएं पैदा हुईं तो अपने अखबार में बेचैनी भी पैदा होने लगी। क्योंकि, इन तमाम जगहों पर, महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ की जाने वाली तमाम यात्राओं में संपादक जी का नाम ही सर्वोपरि होता था।
बाजार का प्रभाव मीडि‍या पर है, इसमें कोई दो-राय नहीं है और बाजार का प्रभाव इसलि‍ए भी पड़ेगा क्‍योंकि एक 16 पृष्‍ठ वाला अखबार बनाने के लिए लगभग 18-20 रुपये का खर्चा आता है और पाठक अखबार खरीदता है 2 या तीन रुपये में। अब इनमें जो 15-16 रुपए का गैप है, उसे बाजार भरता है। बाजार अगर देगा तो लेना भी चाहेगा।
पत्रकारिता में अरुण शौरी ने मुझे बेहद प्रभावित किया। उनके एक इन्‍टरव्‍यू को मैंने पढ़ा जिसमें उनसे किसी ने पूछा था कि खोजी पत्रकारिता क्या है? श्री शौरी का जवाब था कि सरकारी कागजातों के मध्‍य वि‍रोधाभास ढूंढना ही सबसे बड़ी खोजी पत्रकारिता है। वाकई में खोजी पत्रकारिता फावड़े या कुदाल को लेकर नहीं किया जा सकता।
रजनीश में रुचि उनकी सबसे चर्चित पुस्तक ‘संभोग से समाधि की ओर’ से पैदा हुई पर महावीर और कृष्ण पर उनकी पुस्तकों ने उनके प्रति सम्मान का भाव जगाया।
पत्रकारिता में ड्रिंक का महत्‍व इतना है कि यदि‍ आप किसी प्रोफेशनल बैठक में हैं, तो सामने वाला व्‍यक्‍ति‍ आपसे खुलता जाता है। अमूमन हम सब स्वयं से भागने के लि‍ए शराब पीते हैं। शराब आपको कुछ देता-दिलाता नहीं है। लेकिन कुछ भूलने में, सहज होने में मदद जरूर करता है।
कहां तो तय था चि‍रागा हर एक घर के लि‍ए

यहां चराग मयस्‍सर नहीं सहर के लि‍ए’
अगर अख़बार चारण का काम करने लगेंगे तो जनता के सवालों को सरकार तक कौन पहुंचाएगा?
सरकार की योजनाओं और कामों को प्रचारित करने के लिए जनसंपर्क विभाग होता है। हर सरकार यही चाहती है कि उसके अच्छे कामों का प्रचार हो और सरकार की कमज़ोरियां बाहर न आएं. सरकार की विफलताओं और कमजोरियों को जनता के सामने लाना मीडिया का काम है. लेकिन बिहार में स्थिति अलग है. बिहार में अघोषित सेंसरशिप लागू है. पटना के अख़बारों ने नीतीश सरकार की ग़लतियों और बुराइयों को छापना बंद कर दिया है. सरकार के ख़िलाफ़ ख़बर छापने पर अख़बार मालिकों को माफी मांगनी पड़ती है और ख़बर लिखने वाले पत्रकार को सजा मिलती है. बिहार के मीडिया ने सरकार के सामने घुटने टेक दिए हैं और वह जनसंपर्क विभाग की तरह काम कर रहा है.
रूप में छपवाने की कोशिश की, लेकिन फिर भी किसी अख़बार ने उस ख़बर को छापने की हिम्मत नहीं की। बिहार के अख़बारों पर नज़र डालें तो एक अजीबोग़रीब पैटर्न दिखता है. पहले पेज पर सरकार के अच्छे कामों का बढ़ा-चढ़ा ब्यौरा मिलता है, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अच्छी तस्वीर होती है और बाक़ी जगह पर हत्या, बलात्कार और लूट की ख़बरें होती हैं. जितना विकास हुआ नहीं, अख़बार उससे कहीं ज़्यादा ढोल पीटते हैं. नीतीश कुमार के विरोधियों, दूसरे नेताओं और उनके विचारों को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाता है. बिहार के कुछ पत्रकारों से बात करने पर पता चला कि वे राज्य की समस्याओं के बारे में लिखना चाहते हैं, लेकिन उनकी कलम को रोक दिया जाता है. जिस अख़बार में नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ ख़बर छप जाती है, उस अख़बार को सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो जाता है. यह तब तक बंद रहता है, जब तक अख़बार के मालिक बिहार सरकार के मुखिया के पास जाकर गिड़गिड़ाते नहीं हैं.
ज़्यादातर अख़बार और न्यूज़ चैनल चारणों की तरह नीतीश सरकार की शान में क़सीदे ऐसे पढ़ते और लिखते हैं कि जैसे आप बिहार सरकार का चैनल देख रहे हों या फिर बिहार सरकार के पब्लिक रिलेशन डिपार्टमेंट का कोई पर्चा पढ़ रहे हों। इस साल चुनाव होने वाले हैं. नीतीश सरकार अपने पांच साल पूरे करने वाली है, लेकिन इस कार्यकाल के दौरान क्या-क्या कमियां रहीं, यह छापने या दिखाने की हिम्मत कोई भी अख़बार या न्यूज़ चैनल नहीं कर सका. कुछ लोग यह कह सकते हैं कि बिहार सरकार मीडिया को मैनेज कर रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि मीडिया ख़ुद बिकने के लिए बाज़ार में खड़ा है. सरकार को उसे मैनेज करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह ख़ुद मैनेज होने के लिए तैयार बैठा है.
एनडीए की सरकार ने भी शाइनिंग इंडिया के विज्ञापन के नाम पर मीडिया को करोड़ों रुपये दिए थे। उस व़क्त भी अख़बारों और टीवी चैनलों ने चुनाव से पहले एनडीए की सरकार को विजयी घोषित कर दिया था. उस चुनाव का परिणाम क्या निकला, यह भी हम लोगों के सामने है. सरकार के जनसंपर्क विभाग की तरह काम करना बिहार में पत्रकारिता का नया चेहरा है. क्या कारण है कि हड़ताल से बिहार में पूरा तंत्र चरमरा जाता है और अख़बारों में इस ख़बर को अंदर के पन्नों में छोटी सी जगह मिल पाती है. क्यों सरकार के विरोधियों को विलेन के रूप में पेश किया जाता है. नीतीश सरकार ने सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल कर अख़बार मालिकों को लालच दिया और अख़बारों को पालतू बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.]
हार में यह अघोषित सेंसरशिप बहुत ही सुनियोजित ढंग से लागू की गई है और अख़बारों को अपने हित में इस्तेमाल कर उन्हें राज्य सरकार का एजेंट बना डाला गया है. मंदी के दौर में नीतीश सरकार ने मीडिया की कमज़ोरी को भलीभांति समझा और सरकारी विज्ञापन को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया. ऐसे-ऐसे हथकंडे अपनाए गए, जिन्हें हम तानाशाही से जोड़ कर देख सकते हैं. लालू-राबड़ी की सरकार के दौरान बिहार में जंगलराज पर हमेशा कुछ न कुछ ख़बरें छपा करती थीं, लेकिन वर्तमान दौर में ख़बर छापने से पहले इस बात का ख्याल रखा जाता है कि सरकार के मुखिया का राजनीतिक क़द कम न हो जाए. दरअसल, नीतीश सरकार ने मीडिया की कमज़ोरी को पहचान लिया है. और, यह कमज़ोरी है विज्ञापन की. नीतीश सरकार ने विज्ञापनों के सहारे मीडिया को नियंत्रित रखने का काम बख़ूबी किया है. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से साल 2005 से 2010 के बीच (नीतीश कुमार के कार्यकाल के चार सालों में) लगभग 64.48 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिए गए. जबकि लालू-राबड़ी सरकार के कार्यकाल के अंतिम 6 सालों में महज़ 23.90 करोड़ रुपये ही ख़र्च हुए थे.

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

रामधारी सिंह दिनकर

जिस गौरव का नित धयान रहे,
हम भी है कुछ यह ज्ञान रहे .
सब जाये अभी पर मान रहे ,
मरणोत्तर गुंजित यह गन रहे .......
निज गौरव और स्वाभिमान की बात करने वाली ये पंक्तिया राष्ट्रवादी कवी राम धारी सिंह दिनकर के अलावा कौन लिख सकता है . जिनका जन्म २३ सितम्बर, १९०८ को बिहार के बेगुसराई के सिमरिया गाव में हुआ था। दिनकर जी अपने युवा दिनों में भगत सिंह और आजाद के विचारो से प्रभावित थे ।
समर शेष है, जनगंगा को खुलकर लहराने दो,
शिखरों को डूबने और मुकुटो को बह जाने दो।
पथरीली, ऊँची जमीन है? तो उसको तोड़ेंगे,
समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे।
समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसते तीर,
खंड-खंड हो गिरे विषमता के कलि जंजीर।
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल वैयाध,
जो तटस्थ है, समय लिखेगा इनका भी अपाराध.........
दिनकर जी के कविताए देशप्रेम और देशभक्ति के अपने आप में मिशाल होती है। ये मेरे जैसे तुअच लोगो के कहने के लिए नहीं है।